बाल मनुहार
हर बालक का हक है
पर
जब हाँथों में
खेल का सामान
किताबों के बैग
गले में टाई
पानी की बोतल
पैरों में जूते
और भी बहुत कुछ
यह सब न मिले
फिर
वह बचपन
अपने अस्तित्व से लड़ता हुआ
सर पर टोकरी
हाँथों में फावड़ा लेकर
सिसकियाँ भरता
आ खड़ा होता है
मजदूरों की भीड़ में
एक समय था
आने दो आने
अठन्नी चवन्नी
में भरता था पेट
पर आज दस बीस में भी नहीं
भरता है पेट ,
कोई बालक
इससे ज्यादा भी पाता है क्या ?