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Monday, August 3, 2009

बालक का हक़

बाल मनुहार
हर बालक का हक है
पर
जब हाँथों में
खेल का सामान
किताबों के बैग
गले में टाई
पानी की बोतल
पैरों में जूते
और भी बहुत कुछ
यह सब न मिले
फिर
वह बचपन
अपने अस्तित्व से लड़ता हुआ
सर पर टोकरी
हाँथों में फावड़ा लेकर
सिसकियाँ भरता
आ खड़ा होता है
मजदूरों की भीड़ में

एक समय था
आने दो आने
अठन्नी चवन्नी
में भरता था पेट
पर आज दस बीस में भी नहीं
भरता है पेट ,
कोई बालक
इससे ज्यादा भी पाता है क्या ?