Monday, August 3, 2009

बालक का हक़

बाल मनुहार
हर बालक का हक है
पर
जब हाँथों में
खेल का सामान
किताबों के बैग
गले में टाई
पानी की बोतल
पैरों में जूते
और भी बहुत कुछ
यह सब न मिले
फिर
वह बचपन
अपने अस्तित्व से लड़ता हुआ
सर पर टोकरी
हाँथों में फावड़ा लेकर
सिसकियाँ भरता
आ खड़ा होता है
मजदूरों की भीड़ में

एक समय था
आने दो आने
अठन्नी चवन्नी
में भरता था पेट
पर आज दस बीस में भी नहीं
भरता है पेट ,
कोई बालक
इससे ज्यादा भी पाता है क्या ?

5 comments:

ACHARYA RAMESH SACHDEVA said...

AHUT KHUB
JO PATA H WAHI SATATE H
GARIB KE BACHCHE TO KACHRE SE PAL JATA H.
NA UNHE BIMARI AATI H AUR NA HI RANJ
HAMRE UTHNE SE PAHLE HI, KACHRA SATH LE JATE H.
KYNOKI WO HAR ROZ KAAM PE AATE JATE H.
SUBAH KI SHURAAT WO TV MEIN NAZARE GAAD KAR NAHI,
SHAM KE BHOJAN KE LIYE HUGAD LAGATE H.
RAMESH SACHDEVA
hpsdabwali07@gmail.com

परमजीत बाली said...

बहुत खूब!!

Dhiraj Shah said...

baalak ka hak milana chahiye |

हिमांशु said...

खुबसुरत भाव ।

Jai Prakash Chaurasia said...

कामना है हर बालक को उसका ह्क