Saturday, August 29, 2009

छान लिया मछुआरों ने

आज संझवत नहीं लगा
कलुआ ने भूख से दम तोड़ दिया था
असहाय हो गये बीबी बच्चे
असहाय जी रहे जीवन में
मंहगाई ने ऐसा मारा
दो जून की रोटी
एक जून की हो चली थी
मजदूरी भी कौन करेगा...?
दो बच्चों की मां के लिए
दाह संस्कार का जुगाड़
किसी पर्वत लांघने  से कम न था
छोड़ लाश के पास बच्चों को
साहुकार के पास 
शादी के पायल के बदले पैसे लेने
अन्तिम कर्म भी सहज न हो सका ।

लालन-पालन,भरण-पोषण,
हो गयी स्व्प्न की बातें
जीवन के अन्तिम सच की ओर चल दी.....
गंगा मईया ले लो अपनी गोद में हमें
वहां भी शरण ना मिला
छान लिया मछुआरों ने
जब मौत भी गले ना लगाए
इस जीने का क्या होगा
कैसे सोच लेते हैं सब .......?
ऐसा जीवन जीने से मर जाना ही अच्छा.....!

3 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

ऐसी मँहगाई है कि चेहरा ही बेंचकर अपना खा गया कोई
अब न अरमान हैं न सपने हैं सब कबूतर उड़ा गया कोई ।


तीव्र संवेदना की भोर आपकी लेखनी में भी दिख ही रही है । उजाले की मुँहजोर प्रतीक्षा में ही बैठे न रह जाइयेगा । रचना का आभार ।

JHAROKHA said...

Bahut hee samvedanatmak kavita ....sundar shabd...

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT SAMVEDAN SHEEL HAI AAPKIO RACHNA.... GAREEBI KI YANTRANA KO SAAKSHAAT LIKH DIYA HAI AAPNE .... SHASHAKT ABHIVYAKTI HAI