Wednesday, August 26, 2009

आपका जीवन दर्शन तो है

नियति का खेल
बड़ा अजीब होता है
बच नहीं सकता है कोई इससे
इस जगत में।
जगत भी एक बगिया है
ईश्वर इसका माली है
इस बगिया का हर अच्छा पुष्प
जिसे वह समझे........
यह अपनी पूर्णता ओर है
सभी पुष्पों में उसे सबसे पहले
तोड़ लेता है
उसके तोड़ने के पीछे
संभव है पुष्प के विकृत होने से बचाने का भाव हो ।

आप नहीं हो हमारे साथ
आपका जीवन दर्शन तो है ......!
                                                                    

                                                                       ( पिता जी की २८वीं पूण्यतिथि पर उनको समर्पित)            
                                                                                               

9 comments:

अनूप शुक्ल said...

अच्छे भाव!

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर रचना के लिए बधाई!

हिमांशु । Himanshu said...

जिनके छाया-चिन्ह तुम्हें उत्प्रेरित करते हैं वे छाया बन जाने की अनिवार्यता लेकर ही उपस्थित होते हैं इस जगत में । ईश्वर की अनुकंपा उन्हें ही तो प्राप्त होती है क्षण-क्षण । अवधि का नहीं, विविध का प्रतिपाद्य ढूँढ़ना होगा हमें उनके जीवन-क्रम में ।

बात सबसे पहले की भी नहीं - सबसे जरूरी की है । जरूरत कब आन पड़े ? कौन जाने ? निःशेष तो रह जाता है एक एक सम्पुट उनकी अनुभव शृंखलाओं की चासनी में पगा ।

भावात्मक कविता का आभार ।

काव्या शुक्ला said...

Saathak bhaav.
वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

सुलभ सतरंगी said...

अति सुन्दर. भावुक प्रस्तुति.

- सुलभ सतरंगी (यादों का इंद्रजाल)

Dhiraj Shah said...

sundar darshan

pita jee ki punyatithi par unako sat sat naman

JHAROKHA said...

Bahut achchhee lagee ye rachna....bhavnatmak...aur sahaj shabdon men likhee gayee.
Poonam

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बेहतरीन भावाव्यक्ति!!!!