Sunday, August 16, 2009

बाबूजी की बेटियां

बाबूजी की बेटियां
अब
पापा की बेटियां हैं
बेड़ियां
गये जमाने की है बात
नहीं सिमटा है जीवन
केवल चूल्हे- चौके,राशन-पानी तक
लड़कों से कम नहीं है उनकी उड़ाने
वह भी
बैग टांगे
सायकिल से स्कूटी से बसों से
करती हैं यात्रायें
बेहतर जीवन
जीना
अब
कपोल कल्पना नहीं.....।

4 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

भौतिक सुविधायें और कुछ भौतिक स्वंत्रतायें स्त्री को बंधन-मुक्त नहीं कर सकती । जरूरी है आत्मबल । मनोदशा का स्वातंत्र्य चाहिये ।
कविता बेहतर है ।आभार ।

शोभा said...

bahut hi achha likha hai.

ओम आर्य said...

behatarin ......badhaaee

Suman said...

nice