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Tuesday, October 13, 2009

आओ ! बातें करें.....

आओ ! बातें करें
आज क्यों नहीं है सुख-शान्ति ?

आओ ! बातें करें
कितना अस्त-व्यस्त है जन-जीवन ?

आओ ! बातें करें
इतना क्यों हाहाकार मचा है ?

आओ ! बातें करें
अरमानों ने क्यों दम तोड़ा है ?

आओ ! बातें करें
इन्तजार की घड़ी इतनी लम्बी क्यों है ?

आओ ! बातें करें
दरस को प्यासे नयन क्यों हैं ?

आओ ! बातें करें.....!

Saturday, October 10, 2009

......सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक

जब तुम्हारी उपस्थिति होती है
अनोखा पर्यावरण
निर्मित हो जाता है
सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक

उसमें नहीं होता
ओजोन छिद्र का प्रभाव
नहीं होती है मात्रा
आर्सैनिक की पानी में
नहीं चिन्ता घटते जल स्तर की
नहीं है विषाक्त गैसों का प्रभाव
और कुछ भी नहीं होता क्षत-विक्षत......!

वहां
वह सब कुछ है
जिनसे मिलती हैं
अनन्त खुशियां
स्वच्छ वातावरण
चंहुदिश हरियाली
पक्षियों का कलरव
जिस जहां में यह सब हो
उसकी रचना कैसी होगी
तुम्हारे अंकेक्षण में
सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक
कहां और किसकी होगी परीक्षा ।

Friday, September 25, 2009

बादल मंडरा रहे हैं...!

बादल मंडरा रहे हैं
खुशियों के
जाने कब बरस जांय
कर दें सराबोर
इस पूरे आभामंडल को ।

रोम रोम हो जाय
पुलकित
तुम्हारे आने की
तमन्नाओं का सफर
जल्द ही रंग लायेगा ।

ऐसा लगता है
मंजिल अपनी ओर
सायास ही
रंग बिरंगे स्वप्न लिये
आकर्षित कर रही है ।

तुम साथ हो तभी
सारी खुशियों की रवानी है
आ जाओ जब
सब कुछ बेहतर सा दिखने लगता है-
सुबह खिली खिली सी..
शाम रंगीन और भी बहुत कुछ..!

साथ ही मूल्यांकन करता हूं जब
हर रात सोने से पहले
दिन भर का
हर क्षण मूल्यवान सा दिखता है ।

Monday, September 21, 2009

झंकृत स्वर....!

झंकृत स्वर
गुंजायमान हो उठा
एक बार फिर
लम्बे अन्तराल के बाद ।

तुम ठीक उसी तरह आज भी दिखे थे
सादगी के आभूषण
आज भी सुशोभित हो रहे थे
आत्मविश्वास से भरा देख
प्रमुदित हो रहा था मैं ।

तुम्हारा झल्लाना
अब
मधुर मुस्कान में
तब्दील चुका था...!

शारदीय नवरात्रि में
संयोगात अलग - अलग पंक्ति में
साथ ही आशीर्वाद जैसे
वर्षों से चली आ रही परंपरा
सी हो गयी हो...!

ठीक उसी सिद्धान्त की तरह
जैसे-
"आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब
तीनो एक ही बिन्दु पर होते हैं ।"

समय की गति ने रफ्तार ली
लेकिन
हम दोनों वैसे ही हैं
जैसे होते हैं नदी के किनारे
जिन्हें नहीं होना साथ साथ
बस लहरें हैं प्रेम की
जिससे होता है भावास्पर्श
हमारा - तुम्हारा...!

Saturday, September 19, 2009

क्षणिकाएं...!

तुम न थे
तो जिन्दगी न थी
तुम आये जिन्दगी में
तो रौनक आयी ।

तुम्हारे सामने
कुछ कह भी न सके
दिल की बात
दिल में ही रह गयी !

तुम्ही बताओ
तुम्हारे वास्ते के सिवा
अपना
भी कोई रास्ता था...?

मेरे मालिक !
तु मुझे बेरुखी न दे
तेरे दर से
ऐसे भी कोई जाता है !

तुमने देखा
तो मुंह फेर लिया
हम तो आये थे
तेरा होने को !

Wednesday, September 16, 2009

मेरे जीवन का सर्वस्व...!

हमारा और तुम्हारा साथ
अभी से नहीं
जनम - जनम से है
तुम्ही कहते हो...!

तुम्हारे चेहरे की अकुलाहट
नहीं समझ में आती
क्यों बेचैन हो उठते हो
विचलित हो जाता है मन
अविवेकी हो जाता हूं ।

अरे !
तुमसे अलग कैसे हो पाऊंगा
अलग होने का भाव जुड़ा है-
लोभ, मोह, मद,से ।

तुम और हम
आसक्ति के वशीभूत नहीं
प्रेम बांधता नही हमें
मुक्त करता है
उन समस्त प्रवंचनाओं से
जो हमारे मार्ग में बाधक हैं
कैसे समझाऊं तुम्हें
मेरे जीवन का सर्वस्व
तुम्हारे निमित्त है...!

Saturday, September 12, 2009

धरती सा धैर्य का परिचय देते हो....!

तुम अनुपम हो
सृष्टि के सभी तत्व
धरती, आकाश, अग्नि, जल,हवा
सबने तुम्हें रचने में
अपना सर्वस्व उड़ेल दिया
तुम्हारे व्यक्तित्व में
ये सभी तत्व अपनी पूर्णता लिए
विद्यमान हैं
धरती सा धैर्य का परिचय देते हो
जब भी परिस्थितियां  अनुकूल नहीं होती
कहीं भी तुम्हारी उपस्थिति होती है
पूरी महफिल में
आकाश सा छा जाते हो
संयोग का ऐसा मिलन
क्षितिज पर जैसे धरती और आकाश
मानस विचरण करने लगता है
मुक्ताकाश में
तुम्हारी वाणी में ऐसा प्रवाह
जो किसी हवा के बेहतर गुणधर्मों से कम नहीं
यह तत्व भी शोभायमान हो जाता है
तेजमय मस्तक यदि रूद्र  रूप में आ जाय
आभामंडल में कुछ भी असंभव नहीं
ऐसे परास्त करते हो जैसे
परास्त करना हंसी-खेल हो
इन सबके साथ
नीर ..अपनी शुचिता लिए
झील सी नीली आंखों मे विद्यमान है
दृष्टि जिसपर पड़ जाय
कर दे उसे पावन
निर्मल मनभावों से ........।

Wednesday, September 2, 2009

सागर से लहरें उठती हैं

सागर से लहरें उठती हैं
साहिल की ओर
निरन्तर बढ़ने को उत्सुक
इनकी उमंगें
शान्त पवन को झकझोरती हूई
निर्द्वन्द, निर्लिप्त निश्चेष्ट भाव से
पुकार रही हैं.................।
आओ......!
मुझमें निहित अन्तष्चेतना के साथ
यात्रा करें उस ओर
जहां बसती है दुनियां
रंग बिरंगी
प्रकृति के कुछ अद्भुत नजारे।

इन नजारों को
निरखने को तत्पर
हमारी आंखें
करने को अंकित आतुरता से.....!
अपने मानस पटल पर
रच जाय ऐसा आयाम
जो दे सके
अकल्पित, शाश्वत, निर्मल ,पावन
हृदयंगम हो जाय
ऐसी खुशियां
सबके बीच सौहार्द्र..........!

Tuesday, September 1, 2009

समय भी अब धीरे-धीरे चलने लगा

कब से देखता रहा तुम्हारी राह
तुम ना आये
तुम्हारा न आना
समय की गति को भी परिवर्तित कर दिया ।

समय भी अब धीरे-धीरे चलने लगा
आज तुम न सही
तुम्हारी यादें तो हैं
बीते हुए कल का
जब भी पलटता हूं
एक-एक पन्ना
तुम्हारे साथ जिया एक-एक पल ।

हरा हो जाता है क्षण-क्षण
और फिर  खो जाता हूं
उस पल में
कुछ भी याद नहीं रहता
कि और भी कुछ करना है।

तुमने दिया था एक सम्बल
हमारे स्वत्व को
और पुन: लौटा मुझमें आत्मविश्वास ।

Monday, August 31, 2009

कैसे सह लेते हो तुम

तुम प्रकृति की अद्भुत रचना हो
तुममे  विलक्षणता के सारे गुण हैं
धन्य हुआ होगा ईश्वर भी
धरती पर तुम्हें भेज के
तुम्हारी कार्य शैली
चातुर्य, व्यस्तता,
हर फन में पारंगत होना
साथ ही
सबको खुश रखने का गुण
मन मोहक  है

हम भी कायल हैं तुम्हारी
जीवन शैली के
कैसे कर लेते हो तुम
यह सब
कैसे सह लेते हो तुम
यह सब
सबकी सन्तुष्टि बीच
कहां से चुरा लेते हो
समय
अपना अपनेपन के लिये

तुम्हारा जीवन
एक रहस्य से कम नहीं......!

Sunday, August 30, 2009

क्या लड़कियों से नहीं संवरता है जीवन

कल तुम्हें देखा
एकटक निहारते हुए
तुम्हारी आंखों मे
गुजरे हुए कल की तस्वीर
स्पष्ट दिख रही थी
अब तुम लड़की से स्त्री हो चली थी
तुम्हें देख के ऐसा लग रहा था
मानो तुम्हारे मनोभाव
अपने आप को कोस रहें हो
हमें देख कर साथ-साथ।

अगर मैं भी लड़का होती
मुझसे जीवन में कुछ भी न छूटता
न मां-बाप का घर
ना ही सखि-सहेलियां
सब कुछ पास होते
अब तो पिया का घर
ही अपना आशियाना है।

मां ही क्यों कहती है......
वंश तो लड़के चलाते है
लड़की को पराये घर जाना है
उद्विग्न हो उठता है मन।

शायद मां  भूल जाती है
वह भी एक लड़की ही है
फिर क्यों करती है भेद
क्या लड़कियों से नहीं संवरता है जीवन .........? 

Sunday, August 2, 2009

प्रेम का एहसास

प्रेम का एहसास
एहसास मात्र ही नहीं है
इसे समझना शायद
सबके बस की बात नहीं है
इतनी आसानी से कोई कह दे
कि "मैं तुमसे प्यार करता हूँ "
यह बात गले से नहीं उतरती
इसका होना तो तब होता है
जब एक हूक सी उठे
जो तोड़ कर रख दे
सारा अभिमान
अपने होने का गुमान
और अपने दिल की बात
आँखों तक आ जाये
भर दे हृदय को -
निर्मल व पावन भावों से ।


चित्र : गूगल से साभार