Wednesday, September 2, 2009

सागर से लहरें उठती हैं

सागर से लहरें उठती हैं
साहिल की ओर
निरन्तर बढ़ने को उत्सुक
इनकी उमंगें
शान्त पवन को झकझोरती हूई
निर्द्वन्द, निर्लिप्त निश्चेष्ट भाव से
पुकार रही हैं.................।
आओ......!
मुझमें निहित अन्तष्चेतना के साथ
यात्रा करें उस ओर
जहां बसती है दुनियां
रंग बिरंगी
प्रकृति के कुछ अद्भुत नजारे।

इन नजारों को
निरखने को तत्पर
हमारी आंखें
करने को अंकित आतुरता से.....!
अपने मानस पटल पर
रच जाय ऐसा आयाम
जो दे सके
अकल्पित, शाश्वत, निर्मल ,पावन
हृदयंगम हो जाय
ऐसी खुशियां
सबके बीच सौहार्द्र..........!

6 comments:

श्यामल सुमन said...

अकल्पित, शाश्वत, निर्मल ,पावन
हृदयंगम हो जाय
ऐसी खुशियां
सबके बीच सौहार्द्र..........!

खूबसूरत कल्पना। वाह हेमन्त जी।

हिमांशु । Himanshu said...

प्रकृति का जीवन के कण-कण में स्वीकार ! शायद कविता यही कहना चाह रही है ! बेहतर ।

वाणी गीत said...

ऐसी खुशिया सबके बीच सौहार्द्र ..बहुत खूबसूरत ..शुभकामनायें ..!!

दिगम्बर नासवा said...

यात्रा करें उस ओर
जहां बसती है दुनियां
रंग बिरंगी
प्रकृति के कुछ अद्भुत नजारे....

BAHOOT SUNDAR LIKHA HAI ..... ADHBIDH KSHATA HAI SHABDON KI .......

Jai Prakash Chaurasia said...

अनदेखी चीजें काफी अच्छी लगतीं हैं।

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुंदर --इस खुलेपन की जितनी भी तारीफ़ करें कम है, दोस्त।

dher sari subh kamnaye
happy diwali

from sanjay bhaskar
haryana
http://sanjaybhaskar.blogspot.com