Sunday, August 30, 2009

क्या लड़कियों से नहीं संवरता है जीवन

कल तुम्हें देखा
एकटक निहारते हुए
तुम्हारी आंखों मे
गुजरे हुए कल की तस्वीर
स्पष्ट दिख रही थी
अब तुम लड़की से स्त्री हो चली थी
तुम्हें देख के ऐसा लग रहा था
मानो तुम्हारे मनोभाव
अपने आप को कोस रहें हो
हमें देख कर साथ-साथ।

अगर मैं भी लड़का होती
मुझसे जीवन में कुछ भी न छूटता
न मां-बाप का घर
ना ही सखि-सहेलियां
सब कुछ पास होते
अब तो पिया का घर
ही अपना आशियाना है।

मां ही क्यों कहती है......
वंश तो लड़के चलाते है
लड़की को पराये घर जाना है
उद्विग्न हो उठता है मन।

शायद मां  भूल जाती है
वह भी एक लड़की ही है
फिर क्यों करती है भेद
क्या लड़कियों से नहीं संवरता है जीवन .........? 

8 comments:

श्यामल सुमन said...

आजकल लड़कियों से ही सँवरता है जीवन हेमन्त जी। भाव अच्छे लगे।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

औरतें ही चलाती हैं वंश
पुरुषों के

अमिताभ मीत said...

दिनेशराय जी के बात से पूर्णतः सहमत. औरतें ही चलाती हैं वंश पुरुषों के.

रचना said...

yae vansh purush ka kyun kehlaataa haen ??? jab tak vansh purush ka hoga aur aurat ko chalaanae vaali kehaa jayaega hamarae samaaj mae kabhie koi sudhaar nahin aayaega

मीनू खरे said...

बहुत अच्छी कविता. लिखते रहें.

हिमांशु । Himanshu said...

संवेदना छू रही है तुम्हें कुछ बेहतर की अभिव्यक्ति के लिये । लिखते रहें बेहतर अभिव्यक्त होता रहेगा ।

anuradha srivastav said...

बेहतरीन कविता.........

Ratna said...

मेरी एक ही बेटी है। मैं भी ज़िद में हूँ कि मेरा वंश वही चलायेगी।
बहुत कुछ कहा ज़माने ने कि एक ही बेटी काफ़ी नहीं है, बेटा होना चहिये। मैने सोचा, देखा जायेगा, किसी को तो पहला कदम उठाना ही पड़ेगा। है न?