Saturday, October 10, 2009

......सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक

जब तुम्हारी उपस्थिति होती है
अनोखा पर्यावरण
निर्मित हो जाता है
सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक

उसमें नहीं होता
ओजोन छिद्र का प्रभाव
नहीं होती है मात्रा
आर्सैनिक की पानी में
नहीं चिन्ता घटते जल स्तर की
नहीं है विषाक्त गैसों का प्रभाव
और कुछ भी नहीं होता क्षत-विक्षत......!

वहां
वह सब कुछ है
जिनसे मिलती हैं
अनन्त खुशियां
स्वच्छ वातावरण
चंहुदिश हरियाली
पक्षियों का कलरव
जिस जहां में यह सब हो
उसकी रचना कैसी होगी
तुम्हारे अंकेक्षण में
सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक
कहां और किसकी होगी परीक्षा ।

Thursday, October 8, 2009

...साथ ही भूल सुधार के लिये भी

अस्वस्थता
गजब का अवकाश है
चेतन अवचेतन से परे
बस गुजरना भी
चिकित्सकीय परीक्षण से

अस्वस्थता से
स्वास्थ्य-लाभ की यात्रा में
बड़े सरोकार हैं
और पैरोकार भी
बन जाता है स्वास्थ्य-लाभ
एक उत्सव-सा
इस भागमभाग से
कुटुम्ब और समाज
ऐसे अवसर पर
यथोचित भागीदारी से नहीं चूकता
संभव है कि यही सामाजिक आत्मीयता हो
समरसता के लिये
सामंजस्य के लिये
सदभाव के लिये
और साथ ही भूल सुधार के लिये भी ।

Tuesday, October 6, 2009

हां सर्वस्व मेरे.......!

सर्वस्व मेरे !
तम छंटा..
हूं मैं तुम्हारे
आलोक में ।

क्या है ...
निजशेष
उठा लिया है अपनी गोद में
तुम्हारी दृष्टि का सावन
मुसलाधार है या मद्धम
ज्ञात अब क्या बचा है ।

तुम्हारे आशीर्वचनों ने
समूचे दुःखों को हर लिया ...!

हां सर्वस्व मेरे.....!

Sunday, October 4, 2009

ईमानदारी और आस्था ने क्या दिया उसे

आज उसके घर में चूल्हा नहीं जला
हांडी बर्तन सब कोसते रहे
अपने को
खैरात में मिला अनाज
लौटा जो दिया था...!
ईमानदारी और आस्था ने क्या दिया उसे
सिवाय आशा के
ढिबरी भी ढुलक गयी
मां का आंचल भी जल गया ।

बच्चों ने भी कहा -
बाबू को कल काम जरूर मिलेगा
मां का कलेजा मुंह को आ गया
क्या समझदारी और बीच के रास्ते की भावभूमि
आभाव में ही पलती है
लाचार बाप भी क्या कर
सुबह का इन्तजार
क्या नरेगा क्या आम मजदूरी
सबने न्याय किया है .....?
अमीरी और गरीबी की
यह खाईं क्यों नहीं पटती
बस कागज पर रिकार्ड ही सुधरेंगे ।

Saturday, October 3, 2009

हार जीत का मोल नहीं......


हार जीत का मोल नहीं
बस खेले जा रहे हैं बच्चे
ये छक्का
ये चौका
एक रन
दो रन
ये रहा तीन
अब तेरी बारी
अब मेरी बारी
आउट हुआ तो क्या हुआ
फिर से खेलेंगे
रन बना के  छोड़ेंगे ।

इन्हें नही मतलब
रिकार्डों से
आइ सी सी से
हार जीत से
इनका खेल तो बस
आनन्दोत्सव  है......!



                                                               (चित्र गूगल से साभार)

Friday, October 2, 2009

सांझ बिहान की यात्रा में...

सांझ बिहान की यात्रा में
अनेकों पड़ाव
रात्रि
रात्रि के पहर
अगला चरण भोर का
ब्रह्ममुहूर्त
पक्षियों का कलरव
मानस को झंकृत करने को आतुर....!
सूरज की किरणें
नित नयेपन को आमंत्रण दे रही हैं ...!

Thursday, October 1, 2009

अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल.......!

कहते हैं
गत कर्मों का फल
यहीं मिला करता है
शायद यह सच भी है !

प्रकृति बार बार
सचेत कराती है
आओ !
अपने साथ हो रहे घटित से
सबक लो....!

अहंकार में मदमस्त मानव
अर्थ और काम में मस्त हो
खुद को लुटते देखकर भी
होश में जाने कब आये
क्या पता........?

उसे संजीवनी तो बस
अर्थ ही है
अर्थ का हांथ से फिसलना
अपने समानधर्मी गति से हो
यह
सार्थक अर्थों वाली होती है
और जब यही फिसलन
असमानधर्मी हो जाय
सारे समीकरण पल भर में बदल जाते हैं ।

फिर
अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल
कितना रह जाता है....!