Sunday, September 26, 2010

धर्मव्रता

Gandhari : Image from Google
महाभारत का युद्ध आरंभ होने से पूर्व दुर्योधन का मन आशंकित होने लगा । पांडवों की सेना,उनके परमवीर, उनका साहस देखकर दुर्योधन को अपनी विजय में शंका होने लगी । वह बहुत ही चिन्तित हो गया । उसके सभी साथियों और भाईयों ने उसे समझाने का प्रयत्न किया , लेकिन उसका मन किसी केभी आश्वासन सुनने और मानने के लिये तैयार नहीं था ।

अन्त में द्रोणाचार्य ने उसे सलाह दी कि उसकी माता गान्धारी परमव्रता हैं,वह अपने बेटे का अहित कभी सोच ही नहीं सकती । अत: यदि वह अपने पुत्र को अजेय होने का आशीर्वाद दे सकें तो फिर चिन्ता की कोई बात नहीं रह जाती है । ऐसा कोई भी कारण नहीं है कि माता गान्धारी ऐसा आशीर्वाद नहीं देंगी ।

दुर्योधन को यह सुझाव उचित लगा । उसे निश्चय हो गया कि माता गान्धारी का आशीर्वाद पाकर वह अजेय हो जायेगा और फिर पांडव उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे । यह सोचकर वह अपनी माता गान्धारी के पास गया । उसने कहा. ”माँ, मैं युद्ध के लिये प्रस्थान करना चाहता हूं, प्रस्थान से पूर्व तुम्हारा आशीर्वाद चाहिये । माँ, मुझे आशीर्वाद दो कि मैं अजेय रहूं,मुझे कोई भी पराजित न कर सके । तुम्हारा आशीर्वाद पाकर मैं शत्रुओं को पराजित कर सकूंगा ।

माता गान्धारी ने कहा , “दुर्योधन , तू भूलता है । अजेय होने का आशीर्वाद मैं तुझे नहीं दे सकती।
दुर्योधन चौंक कर बोला,:ऐसा क्यों माँ ?”

“इसलिये कि ऐसा आशीर्वाद केवल उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जो धर्माचरण करता हुआ सत्य पर टिका हुआ है । तुमतो धर्म और सत्य से बहुत ही दूर हो।“
दुर्योधन विचलित होकर कहने लगा,”पर माँ मै तुम्हारा बेटा हूँ।

“इस सत्य से मैं कहाँ मुकरती हूँ , लेकिन मात्र पुत्र होने से ही मेरे सत्य और धर्म का अधिकारी तू तो नही हो जाता । यदि यह आशीर्वाद मैं तुझे दे दूँ तो मैं अधर्मी और असत्यमार्गिनी कहलाऊँगी । अजेय होने का आशीर्वाद मैं केवल उसी को दे सकती हूँ जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है और उसका एकमात्र अधिकारी युधिष्ठिर ही है ।“

माँ की बात को सुनकर दुर्योधन बहुत ही निराश हो गया । अति दुखी होकर उसने कहा,” तो माँ, मेरे लिये तुम कोई उपाय नहीं करोगी ?”
“उपाय तो युधिष्ठिर ही बतायेंगे । तुम उनके पास जाओ ।“
“पर वे तुम्हारे शत्रु हैं ।“
“तुम्हारी आँखें उन्हें शत्रु ही देखेंगी , किन्तु वे एक धर्म-परायण व्यक्ति हैं । विजय का उपाय तुम्हें अवश्य ही बतायेंगे । जाओ उनके पास ।“

विचारों में खोया-खोया दुर्योधन मन-ही-मन माँ की बात ध्यान में लेकर युधिष्ठिर के पास पहुँचा ।और अपने आने का अभिप्राय कह सुनाया ।
युधिष्ठिर कहने लगे, "यह तो बहुत ही आश्चर्य की बात है कि माँ गान्धारी ने तुम्हें मीरे पास भेज दिया है । वे मुझे धर्म परायण समझती हैं लेकिन इस समय पृथ्वी पर उनसे बड़ा धार्मिक व्यक्ति कोई है ही नहीं ।"

युधिष्ठिर के मुह से यह सुनकर दुर्योधन को अच्छा तो लगा लेकिन उसे पता था कि माता गान्धारी आशीर्वाद नहीं देंगी । उसने युधिष्ठिर से पूछा, "क्या सचमुच भैया इसमे संदेह और शंका के लिये तो बिल्कुल भी स्थान नहीं है, पर भैया मुझे स्पष्ट समझाओ कि धर्म और सत्य के विषय में बड़ा कौन है – आप अथवा माता गान्धारी 
"निश्चय ही माता गान्धारी । मैने कहा कि इस समय संसार भर में सबसे अधिक सत्यमार्गी होने का पुण्य और सौभाग्य माता गान्धारी कि ही प्राप्त है ।"

"इसका क्या प्रमाण है ?"
"इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि आज तक किसी नारी ने अपने पति के अवगुण को आत्मसात नहीं किया है जबकि माता गान्धारी विश्व की पहली स्त्री हैं जो पति के अन्धे होने के कारण स्वयं भी आँखॊं पर उसी दिन से पट्टी बाँधकर जी रही हैं जिस दिन से उनका विवाह हुआ । पति के अन्धेपन का दुख भोगे और पत्नी आँखॊं का सुख भोगे इस विषमता को दूर करने के लिये ही उन्होँने विवाह के प्रथम दिन से ही आँखॊं पर पट्टी बाँध ली थी । बताओ आजतक किसी स्त्री ने धर्म सत्य और पतिव्रत धर्म के मार्ग पर इतना बड़ा बलिदान किया है."

"पर भैया माता ने तो मुझे तुम्हारे पास ही भेजा है ।"
"यह उनकी महानता है कि वे अपने कॊ इतना बड़ा सत्यमार्गी नहीं समझती । लेकिन मैं तुम्हें उपाय बता रहा हूँ । तुम माता के सामने सर्वथा नंगे होकर चले जाओ और उनसे निवेदन करो किवे एअ बार आंखॊं से पट्टी हटा कर तुम्हारे सारे शरीर को देख लें और उसपर पूर्ण दृष्टिपात कर दें । ऐसा होने पर तुम्हारा सारा शरीर ही वज्र का हो जायेगा । फिर उसे कोई भी छेद अथवा भेद नहीं सकेगा ।"

"माता गांधारी का पुण्य और उनकी दृष्टि की दिव्यता, जो पति की भक्ति में रहने के कारण प्राप्त हुई है . तुम उनके पास जाकर दृष्टिपात करने के लिए निवेदन करो ."
दुर्योधन अपनी माता के पास जाकर बोला, "माँ भैया ने कहा है कि तुम अपनी आँखों की पट्टी खोलकर एक बार पूर्ण रूप से मेरे सारे शरीर पर दृष्टिपातकर दो ."

गांधारी ने दुर्योधन की बात को स्वीकार कर लिया . दुर्योधन माता के सामने सर्वथा नंगा होकर नहीं आ सका. लाज के कारण उसने लंगोट पहन ली थी. सामने आने पर माता गांधारी ने अपनी आँखों की पट्टी खोल दी और दुर्योधन के पूरे शरीर पर दृष्टिपातकिया. लेकिन लंगोट वाला हिस्सा तो ढँका हुआ होने के कारण कच्चा ही रह गया, शेष सारा अंग लोहे जैसा वज्र हो गया.

महाभारत युद्ध के अंत में दुर्योधन और भीम में गदा युद्ध हुआ. इस युद्ध में भीम गदा मारते मारते थक गया था, लेकिन दुर्योधन को नहीं मार सका. कृष्ण जानते थे कि लंगोट वाला अंग कच्चा रह गया है. अतः उन्होने भीम को संकेत किया, तभी दुर्योधन मारा जा सका था .
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यह कथा किताबघर से प्रकाशित श्री ब्रजभूषण की पुस्तक नारी गुणों की गाथायें से ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर रहा हूं ।  पुस्तक की कुछ अन्य कथाओं से नारी के अनिवार्य गुणों से हम परिचित हो सकेंगे । किताबघर और श्री ब्रजभूषण से बिना अनुमति के लिख रहा हूं, क्षमा प्रार्थी हूं इसके लिए । साभार ।
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Friday, September 17, 2010

बाबा सारंगी वाले

अब नहीं आते बाबा
सारंगी वाले
बचपन में
दादी
दिया करती थी
भर पेट भोजन
और
साथ में ढेर सारा दान
प्रसन्न हो
बाबा सुनाते थे --
बदले में
कई निर्गुण..!
हम सब बच्चों की टोली
जमा हो जाती थी उनके आस-पास
हम सभी
बस इतना ही जानते थे
बाबा हैं तो
राम धुन ही गायेंगे....!

अब न दादी रहीं, न दादी का दान, 
समय की करवट ने
छीन लिया बाबा, निर्गुण, रामधुन को ।

तो
अब नहीं आते
बाबा सारंगी वाले....!

Monday, April 5, 2010

कहीं यह पलायन तो नहीं...!






प्रत्याशित सफलता का न होना
नीयति पर ठीकरा कसना क्यों हो...?
कहीं यह पलायन तो नहीं...!
इसकी समीक्षा
ठंडे बस्ते में डाल देती है
गर्म लोहे के ताप को
असफलता से प्राप्त
आग की ज्वाला
यदि सच्ची है
फिर
तपा कर स्वयं को
कुन्दन न बना देगी....!

Wednesday, March 10, 2010

ख्वाब से हकीकत की यात्रा में

http://i.ehow.com/images/a05/1v/tn/go-green-camping-ecofriendly-tips-120X120.jpg
ख्वाब से हकीकत की यात्रा में
अनेक पड़ाव हैं...

आत्मबोध
जहां
तय होता है
भविष्य यात्रा का ...!

नकारात्मकता
जिससे लड़ना है
यदि बढ़ना है
आगे....!

कुछ दूर और चलने पर
मिलेगा....
सकारात्मक भाव
बढ़ेगा हौसला
और

हो सकोगे यथार्थोन्मुख....।

Monday, February 8, 2010

ले जाना है मुझे........!

समय का सामना
निष्ठा से हो
कुछ भी कठिन नहीं
चट्टान सी समस्या भी
दरकने लगती है.....।

उसके बीच से
राह खुद-ब-खुद
आमंत्रण दे रही होती हैं....
देखो.....
मैं राह हूं
आओ ..!
ले जाना है मुझे.....!

वहां
जहां
मंजिल के पार
और भी बहुत कुछ है
क्योंकि जानता हूं मैं
मंजिल तो बस ...
एक पड़ाव है
और
इसके सिवा कुछ भी नहीं.....!

Wednesday, February 3, 2010

उस व्यक्ति के लिये ....

उस व्यक्ति के लिये जिसका कोई स्थानापन्न नहीं मेरे जीवन में ---

आदर्श चुक जाता है वहाँ, विचार झनझनाने लगते हैं । चिन्तना कुछ मुखरित हो अपने सम्पूर्ण स्वरूप में संकलित होने लगती है । दृष्टि उलझने लगती है - कुछ अनचीन्हें, कुछ अनजाने या फिर अन्तर्निहित तत्वों से । दिखायी देता है कभीं यथार्थ तो कभी स्वप्न तो कहीं-कभीं जीवन दर्शन भी । विकसित होते है पत्र कुछ स्नेह के तो आक्रोश भी बड़ा सजग खिलने की चेष्टा में रहता है उत्सुक । फिर भी दिखायी दे जाती है चिन्तारहित मुस्कान , मुस्कान ही नहीं हँसी जो है निश्चिंतता का विश्वास । 

मनुष्यता का वरदान यदि कुछ है तो क्या ? जीवन ! केवल जीवन । जीवन का आधार क्या - सरसता । सरसता के लिये आवश्यक है भाव, स्नेह, और प्रेम । 

वहाँ भाव की प्रवणता है, उसका पारखीपन नहीं । वहाँ स्नेह की शीतलता है परन्तु अतृप्त व्यामोह के साथ । वहाँ प्रेम भी है पर उसका विस्तार नहीं , वह केवल एक संज्ञान है । मनुष्यता तो हावी है उनपर, मगर कुछ भटकती, बिलखती और खोजती अपना ही स्थान । वहाँ जीवन की सरसता भी देखी है मैंने - संवेदी, शंकित, अवगुंठित । 

इनके कुछ होने और इनके कुछ कर देने में अन्तर है । इनका कुछ होना इनकी दृष्टि में कुछ भी नहीं । हाँ, इनका कुछ कर देना एक विशिष्ट अर्थ रखता है । इन्होंने अपने व्यक्तित्व की ऊर्जा भी शायद अपने कार्यों में लगा दी । चतुर हैं, जानते हैं कि व्यक्ति के कार्य उसके व्यक्तित्व के निर्धारक हैं । शायद इसीलिये महत्व कुछ कर देने का है इनके लिये, होने का नहीं ।

उनके लिये कार्य का  महत्व है , महत्व का कार्य नहीं । कौन खाली है जो महत्व के कार्य की खोजबीन में समय गँवाए । किसने सोची हैं परिस्थितियाँ जो महत्व के कार्यों का निर्धारण कर सकें । इनके कार्य का महत्व है । कार्य पहले महत्व बाद में । पहला व्यक्तित्व है जिसने शरीर को आत्मा के बिना गतिशील रखा है ।

Saturday, January 30, 2010

तरलता से ही जुड़ते तुम..

तुम नहीं हो
यह अनुभव
नयन सजल कर देता है,
तुम्हारा होना भी
आँखे भर देता है ।

तरलता से ही जुड़ते तुम
हर कहीं, कभीं भी ।

Tuesday, January 26, 2010

समय व असमय की सार्थकता......


समय व असमय की सार्थकता
द्वन्दात्मक रूप में
क्षण-प्रतिक्षण
उकेरना आरंभ कर देते हैं
हर रंग को
बारी-बारी से
अतीत की घटी घटनाओं में
ठीक वैसे ही
जैसे
कोई व्याख्याता
प्रस्तुत कर रहा हो..
शोधपरक पत्र.....!

सरकते हुए विगत में
दर्ज होना कौन नहीं चाहेगा
परिस्थितिजन्य भटकाव
नियति पर
अनगिन आरोप थोप जाते हैं ...

और
रह जाता है अधूरा सा इतिहास....?

Saturday, January 2, 2010

सायास ही किसी का रुदन नहीं होता......

सायास ही किसी का रुदन नहीं होता , वेदना जब असीम हो जाय सब कुछ धरा का धरा रह जाता है चाहे वह कोई खुशी हो , त्यौहार हो या नव वर्ष ...! कल एक ओर सारे लोग नूतन वर्षाभिनन्दन में मग्न थे और पास में ही पड़ोसन का बेटा गुम हो गया । माहौल अफरातफरी का हो गया । बधाईयों और अभिनन्दन के दौर में ऐसा हो जाना बहुत ही कष्टकारी होता है । एक तो उसका पिता घर से बाहर सुदूर रहता है । घर में उसे व उसकी मां को लेकर छोटी बहन कुल तीन की संख्या थी । पुत्र का इस तरह से गुम होना किसी पहाड़ के टूट के गिरने से कम न था ।

मां के लिए पति की अनुपस्थिति में बेटा ही आधिकारिक संबल होता है । घर का खर्चा किसी तरह से सिलाई - बुनाई, फाल- पीको आदि से चलाना इस इक्कीसवीं सदी की दुनिया में आसान नहीं । उसकी मां को किसी प्रकार से विश्वास दिलाने की कोशिश कब से की जा रही थी कि धीरज रखिये कुछ लोग उसे ढूढने में लगे हैं । मुहल्ले में किये गये सद व्यवहार की परख ऐसे ही समय में होती है जब व्यक्ति विपरीत परिस्थिति से गुजर रहा होता है ।

ऐसी घटनायें अनायास ही मन में चिढ़्चिढ़ापन ला देती हैं कि हे भगवान... ! आखिर में मैने आपका क्या बिगाड़ा था कि विपत्तियों का सामना हमें ही करना हो रहा है । सचमुच आस्तिकता को धक्का लगना स्वाभाविक है ....परिस्थितियां जब विपरीत होती हैं ..विवेक स्वभावत: काम करना बन्द कर देता है । उसके सामने हंसी - खुशी की बात ... उसे मजाक उड़ाने जैसी प्रतीत होती है ।

दूसरों के दिये जा रहे आश्वासन से किसी भी मां के कलेजे को राहत नहीं मिलती । उसे तो बस उसका लाल चाहिये । मां के जीवन का उत्साह बच्चों के लालन - पालन में ही होता है । नियति जब इससे भी उसे वंचित कर दे .....सच में....! उसका सर्वस्व बिखरता हुआ दिखना कहीं से कमतर नहीं । सामाजिक सरोकार सिवाय सहयोग के हृदयाघात को मिटा सका है भला........?

शाम होते- होते वह बालक अपने मित्र व उसके माता - पिता के साथ घर आया । अब क्या था......? गले से लगा रो पड़ी वह...। छोटा सा बालक सूचना का हाल तो जानता ही न था कि घर बताना या न बताना जैसी भी कोई बात होती है .....! उसे तो बस छुट्टी में मौज करना था । मां के लिये पल भर भी बालक ओझल हो जाय, कितना मुश्किल होता है खुद को संभालना । यहां .......सुबह से शाम हो चली थी .........!

Friday, January 1, 2010

अरे ! नया साल, नया साल.....

पड़ोस के बच्चे ने अपने साथी से कहा--
"नया साल तुम्हें मुबारक हो"
साथी ने कहा -
अरे !
साल तुमने दिया ही नहीं
यह क्या कह रहे हो ...?
अरे ! नया साल, नया साल

मेरी मां
जब कहती है-
अरे बाबा !
किताब मुबारक हो
वह हमें किताब जरूर देती है
तुमने हमें साल कब दिया.......?
जो कह रहे हो -
"नया साल तुम्हें मुबारक हो"

Thursday, December 31, 2009

मर्म की टोकरी भरने को है......


मर्म की टोकरी भरने को है
चलायमान सुधियों में
जिसने देखा
कदम से कदम मिलाते
हर क्षण को
चक्रारैव पंक्ति में
जहां
स्थान तलाशती
नित अभिनव होने को
अनगिन खुशियां....।

हां तुम हो पास ही
पर
तीसरा नेत्र कहां
वंचित हूं न......!

Sunday, November 22, 2009

जब जब उठने का अवसर मिला

जब जब उठने का अवसर मिला
धड़ाम से गिरा दिया जाता हूँ मैं
कभी प्रकृति
कभी नियति
कभी किसी बड़ी बीमारी का
आकस्मिक अटैक
कि झट से उबर भी न सको

असर पड़त्ता है मनोदशा पर
रुटीन इकोनोमी पर
अपनों पर
जुड़े शुभेक्षुओं पर ।
सुबह से शाम तक सरकती
जिन्दगी
रात को आराम ले
फिर आ खड़ी होती है कमर कसके
हर क्षणका  सामना डट के करने को

इस चल रही निरन्तर प्रक्रिया में
शरीर के साथ ही  मनोदशा की भी
जम के परीक्षा हो जाती है
आखिर कब तक लगातार
परीक्षा में पास होता रहेगा
शरीर, फिर मनोदशा

चुकना भि तो है नियति
सो स्वभावतः
बीमारी का निशाना बन पड़ा
अब तक जो भी पाने में
बिना खयाल किये
खटाया था
चलो अब जुर्माना दो

जब प्रकृति संतुलन पर आधारित है
देह-धर्म कैसे अलग हो सकता है भला .... ।

Wednesday, November 11, 2009

कितना उचित है....?

अपने ही देश में
राष्ट्र-भाषा की अवहेलना
करने को आतुर होना
कितना उचित है....?

यह ठीक है
हर प्रान्त की अपनी
आंचलिक भाषा हो
बात समझ में आती है
पर
काम-काज में
हिन्दी अपनाने से भागना
कहीं से उचित है भला...।

हिन्दी की स्थापना से आशय
यह कदापि नहीं कि
आपकी आंचलिक भाषा को
उपेक्षित किया जा रहा है....।

बार-बार अपने होने का बिगुल फूकना
बुद्धिमत्ता का परिचायक कहां से है..
राष्ट्र-भाषा की सशक्त उपस्थिति को
कैसे खण्डित कर सकता है कोई.....?

ऐसा करना
अपने आपको
टुकड़ों में बांटने जैसा है.....।

Saturday, November 7, 2009

चली जा रही थी वह ....


चली जा रही थी वह .....!अपनी यादों को झोली में डाल ....। डोली में बैठ ....। छूटा जा रहा था..। बाबुल का घर...। मानो पीछे छूटता हुआ...., नैहर और घनीभूत हो हृदयंगम हो उठा हो । अश्रुधारा अपने कोमल अहसासों को बार-बार समेटे गालों से नीचे तक धार बना बह रही थी । सामने डोली में बैठा सजन भला उसे संभाल सकता था भला , शायद नहीं । चाह कर भी वह विदा करा कर घर ले जा रही ब्याहता को चुप कराने में असमर्थ सा हो रहा था । कहांरो के कदम आगे बढ़ रहे थे और उसका मन अपने बचपन की दुनियां की ओर लौट रहा था..। खो सी गयी वह....।

चार सखियों समेत उसे लेकर कुल पांच की टोली । जिसके लिये कोई काम असंभव नहीं । बचपन से किशोरावस्था के बीच किसी भी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम थी हमारी टोली ।किशोरी होने तक पाबंदियां जो नहीं थी ।सखियों के साथ गंगा जी के किनारे नहाने आते- जाते पुरुष और महिलाओं पर फिकरे कसना ,ठहाके लगाना, मौज-मस्ती करना, स्कूल में मास्टर जी की बातों को हवा में उड़ा देना । घर आकर अपनी कोठरी में जा रजाई तान के सो जाना ,सुबह देरी से उठने के लिये मां से डांट सुनना, बाबू जी के माथे पर अपने बडे़ होते देख चिन्ता की लकीरें । क्या यह सब भुलाया जा सकता है ...? चारों सखियां पहले ही ससुराल जा चुकी थीं । उनके मां - बाप बहुत पैसे वाले जो ठहरे ।

अजीब है समाज का ढांचा । जहां दहेज ने नस-नस में अपना पैसार कर रखा है ।जिस बाप को भगवान बेटी दें उसे धन भी पर्याप्त दें । बिना धन के बेटियां असमय ब्याह दी जाती हैं । चाहे समय से पहले या बाद में । उनके सारे अरमानों पर पानी फिर जाता है । समाज में कितने उलाहनों को सहना होता है उन्हें । हर शोहदों की बुरी दृष्टि से बचना होता है । अपनी अस्मिता व पिता की मर्यादा दोनों के लिये । मेरे बाबू जी पहले ही तीन बेटियों व एक बेटे की शादी करने में अपना सब कुछ दांव पर लगा चुके थे । स्वाभाविक था कि मेरी शादी में बाबू जी से विलम्ब हो । हां ! पिता जी भैया की शादी में दहेज मांगे ही न थे । पर दहेज न मांगने से दहेज न देने की स्थिति का निर्माण नहीं हो जाता । शादी में हम दहेज न लें पर हम किसे मनायेंगे कि आप भी दहेज न लो । बिटिया की शादी करनी है तो दहेज देना ही होगा ।

कितना अजीब होता है नारी का जीवन ? कहीं भी से आस्वस्त भाव नहीं प्राप्त नहीं होता । बचपन में मां - बाप की सेवा ,विवाहोपरान्त पति के अधीन समर्पण भाव ,फिर सन्तान की सेवा । जहां देखो त्याग ही त्याग ...। शायद इसी लिये सहनशक्ति का भाव यूं ही विकसित हो जाता है । सहते- सहते वह इतनी परिपक्व हो जाती हैं कि प्रसव पीड़ा के लिये भी गुजरने को तैयार हो जाती हैं । मर्दों को यदि ऐसी स्थिति से गुजरना शायद इनके बस की बात नहीं ।

ध्यान भंग होते ही देखती है ससुराल आ गया है अब तो  डोली से बाहर नयी दुनियां में निकलने का वक्त है......।

Wednesday, November 4, 2009

कहीं यह मेरे पैरों से.....


राह पर चलता हुआ आदमी
निहार रहा है
राह के कंकड़ों को
जिसने कितनों से  खाया होगा
ठोकर
उसकी ओट में
जा दुबकती चींटी को
यह समझ कर कि
कहीं यह मेरे पैरों से
दबने के डर से
ही नहीं जा चिपकी है
उसकी ओट से
नन्हीं सी जान
जिसे बोध है
जीवन मरण का
आज
आदमी
महत्वाकांक्षा की होड़ में
खुद को भूलता जा रहा है
रास - रंग व भौतिकता से अवकाश
शायद
उसके अपने बस की बात नहीं !

Monday, November 2, 2009

अहंकार के बादल......

रुतबा
शब्द आते ही
सायास

दिलो -दिमाग के किसी कोने में
अहंकार के बादल
घुमड़ - घुमड़
हवा के साथ - साथ
गलबहियां शुरु कर देते हैं

सार्थक विचार
खुद को समेटना शुरू कर देते हैं
ठीक वैसे ही
जैसे
कछुआ विपरीत समय में
सही अवसर के इन्तजार में
समेट लेता है अपने - आपको ।

Tuesday, October 20, 2009

दोराहा......

पापा क्यों नहीं घर आ रहे मम्मी ! दीवाली भी बीत गयी ! बहुत दिन पहले आये भी तो बस पीछे का दो कमरा बनवा गये । बिटिया के सवालों का जवाब मीरा कैसे देती । पिछले कई बार से उनके आने पर बदले हुए हाव -भाव कुछ नकारात्मक संकेत दे ही रहे थे कि बच्चों के बार-बार पूछने पर जवाब देते नहीं बन रहा था । हां उनका एक काम अप्रत्याशित दिख रहा था कि इतने सारे पैसे लगातार रोजमर्रा की कमाई से अधिक कहां से ला रहे थे । राज कुछ समझ में भी न आ रहा था कि इतने पैसे आये कहां से कि पीछे का दो कमरा आसानी से बनवा दिया ।

इधर राहुल पैसे कमाने की बजाय पैसे पाने की ओर ऐसा उन्मुख हुआ कि इतना आगे निकल आयेगा उसे खुद भी पता न था । दुकान पर काम करने की बजाय एक ऐसी औरत जो अपना घर बार सब छोड़ नयी दुनियां की तलाश में आ मिली राहुल से । हां पैसे थे उसके पास । उसने एक मरद की खातिर अपना सारा पैसा - गहना सब इसी राहुल को दे दिया । वह राहुल के बताने पर भी उसकी दूसरी बीबी बनने को तैयार हो गयी । राहुल दो
लड़कों व एक लड़की समेत तीन बच्चों का बाप था । कायदे से  दो वक्त की रोटी भी जुटाना मुहाल था । सोचा कि पहले इसके पैसे से घर बनवा लूं  बीबी और बच्चों को बाद में मना लूंगा । तब तक इसे इधर ही किराये के मकान में रखुंगा । किसी को पता भी न चलेगा । आसानी से घर भी जाया करूंगा और बीबी और बच्चों की परवरिश भी होगी  और इधर कमा धमा एक नया घर बना इसे अलग रखूंगा । दोनों बीबियां अलग-अलग रहेंगी किसी को क्या ऐतराज मैं एक बीबी रखूं या दो । अरे यह तो इतना सारा पैसा हमें दे रही है कि दोनों को भली - भांति रख सकूंगा और बच्चों को आसानी से पढ़ा- लिखा सकूंगा । लेकिन कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था।

राहुल का दोस्त अचानक दूसरी औरत के साथ राहुल को बाजार में देख राहुल का पीछा करना शुरु किया । अवाक रह गया वह । वह उसकी दूसरी बीबी होगी पहली के रहते अन्दाजा ही न था । राहुल तो मुह छिपा रहा था पर वह औरत बोली मैं इनकी दूसरी बीबी हूं । मैने इनके साथ कोर्ट मैरिज की है । कुछ ही महीने में मुझे बच्चा भी होने वाला है । यह जान होश उड़ गये रमेश के । भागा भागा आया गांव । अरे भाभी गजब हो गया । कैसे कहूं आज जो अपनी आंखों से देखा । सब कुछ क्रमशः सुना गया वह । सुनते ही मीरा के पांव तले धरती खिसक गयी । बताने लगी वह कि इसी लिये यह हमसे मुह छिपा रहे थे । मैं भी कहूं कि इतना सारा पैसा आया कहां से कि मकान आसानी से बन गया । हाहाकार मच गया परिवार की जिन्दगी तबाह हो गयी । रमेश ने मोबाईल नंबर दिया । पी सी ओ से बात करने पर फोन दूसरी बीबी ने  उठाया और कहा -- मै राहुल की दूसरी बीबी बोल रही हूं ....। वह घर पर नहीं हैं ..।कोई काम हो तो बता दीजिये मैं बता दूगी । फोन पर ही तू-तू ,मैं-मैं शुरु हो गयी ।उसने कहा-- जो आप के यहां घर बना है वो मेरे ही पैसे का बना है........। मीरा बेहोश हो गिर पड़ी....।

Monday, October 19, 2009

इन बन्धनों से ..........!

नारी.......
त्याग और उत्तरदायित्वों से सराबोर
परंपरायें भी सिर चढ़ के बोलती हैं
हां तुम्हें नहीं मुंह मोड़ना
बरकरार रखना है अपनी परंपराओं को
बरबस ही कैसे बच सकती है
सामाजिक सरोकार
अपनी संपूर्णता लिये
आच्छादित हो जाते हैं
विरोध का स्वर छिप सा जाता है
नहीं निकल पाती आवाज
मुक्त कर दो हमें
इन बन्धनों से ..........!!

Saturday, October 17, 2009

आईये दीपावली मनायें....!

आईये दीपावली मनायें !
प्राकृतिक और पारंपरिक ढंग से
कम से कम
एक दिन साल में ऐसा हो
जिस दिन
घर- आंगन रोशन हो
कृत्रिम रोशनी से नहीं
पारंपरिक घृत व तेल के दीयों से
आतिशबाजी हो
पटाखों की नहीं
सार्थक विचार - अभिव्यक्ति की
गूंज उठे जहां सारा.....।

                                                              ( शुभ दीपावली )

Thursday, October 15, 2009

कहां जायेंगे अरमान...

माता पिता के अरमानों में
लग जाते हैं पंख
बड़ा ही विशाल फलक
हो जाता है निर्मित
जब नन्हा सा बालक
स्कूल जाना शुरू करता है
पिता हर जगह से खर्च में
करता है कटौती
मां घर का बजट है सुधारती
कि कहीं से कोई कमी ना रह जाय
हमारे अरमान तो धूल धूसरित हो गये
बच्चे के अरमानों के पंख न कटें ।

बच्चा अब बड़ा हो चला है
किशोर हो गया है वह
लग गयी है हवा
मादक पदार्थों की
सोहबत का असर जो है
क्या पढ़ाई - क्या लिखाई
अब तो ये डिस्को जाते हैं

कहां जायेंगे अरमान
माता पिता के
उनकी बुराई इतना कहर ढायेगी
क्या पता
बिगाड़ दी बुढ़ौती

वह माता - पिता जिसने जन्म दिया
वही सोचते हैं
जन्म ही क्यों दिया ऐसे बच्चे को ।