आज संझवत नहीं लगा
कलुआ ने भूख से दम तोड़ दिया था
असहाय हो गये बीबी बच्चे
असहाय जी रहे जीवन में
मंहगाई ने ऐसा मारा
दो जून की रोटी
एक जून की हो चली थी
मजदूरी भी कौन करेगा...?
दो बच्चों की मां के लिए
दाह संस्कार का जुगाड़
किसी पर्वत लांघने से कम न था
छोड़ लाश के पास बच्चों को
साहुकार के पास
शादी के पायल के बदले पैसे लेने
अन्तिम कर्म भी सहज न हो सका ।
लालन-पालन,भरण-पोषण,
हो गयी स्व्प्न की बातें
जीवन के अन्तिम सच की ओर चल दी.....
गंगा मईया ले लो अपनी गोद में हमें
वहां भी शरण ना मिला
छान लिया मछुआरों ने
जब मौत भी गले ना लगाए
इस जीने का क्या होगा
कैसे सोच लेते हैं सब .......?
ऐसा जीवन जीने से मर जाना ही अच्छा.....!