एक नारी
अपनी ही बिरादरी की
कैसे हो जाती है दुश्मन
शुरू हो जाता है
अत्याचारों का सिलसिला..
एक, दो,तीन ही नहीं अनेकों
प्रताड़ना है कि अपना स्वरूप बदल-बदल कर
आ जाती है सामने
रुकने का नाम ही नहीं लेती
शायद वह भूल जाती है
उसने भी लिया होगा
मां के ही कोख से जन्म
पली बढ़ी होगी
ब्याही गयी होगी
पिया के घर
संभव है
उसके साथ हुआ होगा भेद-भाव
क्या उस भेद-भाव का बदला
भावी पीढ़ी से लिया जाना
कहां तक उचित है ?
अब तो महिला सशक्तिकरण की बात चल रही है
हर मां को भी आना होगा आगे
ना हो भेद-भाव
बेटी के जन्म पर
गाये जांय सोहर
दादी अम्मा बलैया लें
घर में बाजे ढोल
मनोदशा के विकास में ना हो वह कुण्ठित
वह भी पढे़ उसी स्कूल में
जहां उसका भैया पढ़ता है
उसके उड़ानों के कोई पंख न काटे
जीये अपना जीवन करीने से ।