विकलांगता का होना
किसी अभिशाप से कम नहीं
उसके भेद
चाहे जिस रूप में हो
दुखदायी ही होते हैं ।
शारीरिक विकलांगता हो
वह भी आंशिक
बात उतनी नहीं बिगड़ पाती
जितनी पूर्ण से होती है ।
ऐसे में
कुछ कर गु्जरने का साहस यदि हो भी
अनेक कष्टों को सहना होता है उसे
साथ ही उपेक्षा भी ।
विकलांगता जब मानसिक हो
स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है
शारीरिक विकलांगता में कुछ संभव भी है
और इसमें चेतन - अवचेन का कोई भेद नहीं ।
वाह रे ! नियति
अजीब है यह खेल.....।
लोग इसे पागलपन क्यों समझते हैं
अभिशप्त होने के पीछे
उसका क्या दोष....?