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Monday, February 8, 2010

ले जाना है मुझे........!

समय का सामना
निष्ठा से हो
कुछ भी कठिन नहीं
चट्टान सी समस्या भी
दरकने लगती है.....।

उसके बीच से
राह खुद-ब-खुद
आमंत्रण दे रही होती हैं....
देखो.....
मैं राह हूं
आओ ..!
ले जाना है मुझे.....!

वहां
जहां
मंजिल के पार
और भी बहुत कुछ है
क्योंकि जानता हूं मैं
मंजिल तो बस ...
एक पड़ाव है
और
इसके सिवा कुछ भी नहीं.....!

Tuesday, January 26, 2010

समय व असमय की सार्थकता......


समय व असमय की सार्थकता
द्वन्दात्मक रूप में
क्षण-प्रतिक्षण
उकेरना आरंभ कर देते हैं
हर रंग को
बारी-बारी से
अतीत की घटी घटनाओं में
ठीक वैसे ही
जैसे
कोई व्याख्याता
प्रस्तुत कर रहा हो..
शोधपरक पत्र.....!

सरकते हुए विगत में
दर्ज होना कौन नहीं चाहेगा
परिस्थितिजन्य भटकाव
नियति पर
अनगिन आरोप थोप जाते हैं ...

और
रह जाता है अधूरा सा इतिहास....?

Monday, October 12, 2009

समय की तूलिका से........!

जीवन का एक-एक पल
समय की तूलिका से
रच रहा अप्रतिम इतिहास
जब भी पलट कर देखता हूं
नित अधुनातन हो रहा
अतीत की एक-एक ईंट से
चुनी दीवारों पर
अरमानों के छ्त
न जानें कब पड़ेंगे
विचारों के कपाट
संवेदनाओं के वातायन
कहीं ढूंढते ने फिरें
अपनी पहचान को
यही सोच कर हैरत में हो जाता हूं
आशा - निराशा के बीच
अन्तराल का तनाव
कहीं भटका न दे
हां !
शायद  इसीलिये
पल प्रतिपल
बुनता हूं ऐसा ताना-बाना
विवेकी होकर
कहीं इतिहास का रंग - रोगन बिगड़ ना जाय ।

Thursday, September 10, 2009

आज तुम यहां होते ..!

आजकल हर लम्हा
सवाल पूछता है
कितने बदल गये हो तुम
समय ऐसा करवट लेगा
तुम्हारे जीवन से
अवकाश के क्षण
भी बार- बार पुकार कर
अपना हक मांगेंगे
और तुम उन्हें क्या दे सकोगे ।

पिछले पायदान के पदचिह्न
साथ गुजरे एक-एक पल
का हिसाब करने को बेकरार हैं
कहते हैं
अरे ! मैने ही साथ दिया था
उस वक्त जब तुम्हारी
अपनी कोई पहचान न थी
कदम - कदम पर हौसला दिया
और बेहतर संयोग भी
नहीं होता न्याय तुम्हारे साथ
आज तुम यहां होते ........!

Thursday, September 3, 2009

सब कुछ पहले सा हो गया...

मैने देखा
एक आदमी का जीवन
कैसे बदलता है
समय ने जख्म कैसे भर दिया
कभी उसकी चित्कार ने
झकझोर कर रख दिया
और आज
पुन: आस्थावान है
उसमें जीवन को लेकर
फिर से आस जगी है
नयी नयी बातें करता है वह
सभी
सब कुछ पहले सा हो गया...

शायद यही समय की मांग है..?
निराशा ने दम तोड़ दिया
आज आशावान हो गया है
अतीत के दुख दर्द
गये जमाने की है बात
भावप्रवणता ने उंचाई पा ली है

सब कुछ पहले सा हो गया....!

Tuesday, August 25, 2009

हां ! समय ने दांव दे दिया

मैने देखा
समय ने दांव दे दिया
आज
ऐसा आदमी
जिसने जीवन में किसी के सामने
हांथ फैलाना उचित नहीं समझा
आज वह बिना लाग-लपेट के
पुकार रहा है............
एक ऐसे आदमी को
जो अभी अपनी स्थापना के लिये
दिन-ब-दिन
नये-नये मायने तलाश रहा है
दोनों ने अपना स्नेह निर्झर
ऐसा बहाया
लगा जैसे जीवन सरिता
बह चली
हां ! समय ने दांव दे दिया।