तुम अनुपम हो
सृष्टि के सभी तत्व
धरती, आकाश, अग्नि, जल,हवा
सबने तुम्हें रचने में
अपना सर्वस्व उड़ेल दिया
तुम्हारे व्यक्तित्व में
ये सभी तत्व अपनी पूर्णता लिए
विद्यमान हैं
धरती सा धैर्य का परिचय देते हो
जब भी परिस्थितियां अनुकूल नहीं होती
कहीं भी तुम्हारी उपस्थिति होती है
पूरी महफिल में
आकाश सा छा जाते हो
संयोग का ऐसा मिलन
क्षितिज पर जैसे धरती और आकाश
मानस विचरण करने लगता है
मुक्ताकाश में
तुम्हारी वाणी में ऐसा प्रवाह
जो किसी हवा के बेहतर गुणधर्मों से कम नहीं
यह तत्व भी शोभायमान हो जाता है
तेजमय मस्तक यदि रूद्र रूप में आ जाय
आभामंडल में कुछ भी असंभव नहीं
ऐसे परास्त करते हो जैसे
परास्त करना हंसी-खेल हो
इन सबके साथ
नीर ..अपनी शुचिता लिए
झील सी नीली आंखों मे विद्यमान है
दृष्टि जिसपर पड़ जाय
कर दे उसे पावन
निर्मल मनभावों से ........।