हिन्दी दिवस
हमारी हिन्दी परंपरा के बोध मात्र के लिए ही नहीं
जिससे कि हमारी शब्दावलियां , साहित्य भण्डार,
विरासत में मिले ऐसे साक्ष्य
और हमारी मातृ-भाषा
अपने इतिहास को सशक्त बनाते हों
हमारे पुरोधाओं ने
अपना सर्वस्व न्यौ़छावर कर
गरिमामय संकल्पना से
स्थापित किया इसे
इनकी प्रेरणा
सिमट कर न रह जाय
हिन्दी दिवस मनाने मात्र में-----
बैनर लगाया
किसी को मुख्य अतिथि बनाया
पचीस - पचास के बीच में
स्थितप्रज्ञ हो
ढेर सारी कार्य योजना का संकल्प लिया
और फिर
अपनी - अपनी डफली
अपना - अपना राग
सच तो यह है
अब बहुत हो चुका
क्या बचा है खोने को
हिन्दी दिवस तब्दील हो--
हिन्दी सप्ताह में
हिन्दी माह में
हिन्दी वर्ष में
हिन्दी दशक में
तब तक जब तक कि
रग - रग में हमारी मातृ-भाषा
सर्वश्रेष्ठ रूप में स्थापित न हो जाय ।