अपने ही देश में
राष्ट्र-भाषा की अवहेलना
करने को आतुर होना
कितना उचित है....?
यह ठीक है
हर प्रान्त की अपनी
आंचलिक भाषा हो
बात समझ में आती है
पर
काम-काज में
हिन्दी अपनाने से भागना
कहीं से उचित है भला...।
हिन्दी की स्थापना से आशय
यह कदापि नहीं कि
आपकी आंचलिक भाषा को
उपेक्षित किया जा रहा है....।
बार-बार अपने होने का बिगुल फूकना
बुद्धिमत्ता का परिचायक कहां से है..
राष्ट्र-भाषा की सशक्त उपस्थिति को
कैसे खण्डित कर सकता है कोई.....?
ऐसा करना
अपने आपको
टुकड़ों में बांटने जैसा है.....।
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Wednesday, November 11, 2009
Wednesday, November 4, 2009
कहीं यह मेरे पैरों से.....
राह पर चलता हुआ आदमी
निहार रहा है
राह के कंकड़ों को
जिसने कितनों से खाया होगा
ठोकर
उसकी ओट में
जा दुबकती चींटी को
यह समझ कर कि
कहीं यह मेरे पैरों से
दबने के डर से
ही नहीं जा चिपकी है
उसकी ओट से
नन्हीं सी जान
जिसे बोध है
जीवन मरण का
आज
आदमी
महत्वाकांक्षा की होड़ में
खुद को भूलता जा रहा है
रास - रंग व भौतिकता से अवकाश
शायद
उसके अपने बस की बात नहीं !
निहार रहा है
राह के कंकड़ों को
जिसने कितनों से खाया होगा
ठोकर
उसकी ओट में
जा दुबकती चींटी को
यह समझ कर कि
कहीं यह मेरे पैरों से
दबने के डर से
ही नहीं जा चिपकी है
उसकी ओट से
नन्हीं सी जान
जिसे बोध है
जीवन मरण का
आज
आदमी
महत्वाकांक्षा की होड़ में
खुद को भूलता जा रहा है
रास - रंग व भौतिकता से अवकाश
शायद
उसके अपने बस की बात नहीं !
Monday, November 2, 2009
अहंकार के बादल......
रुतबा
शब्द आते ही
सायास
दिलो -दिमाग के किसी कोने में
अहंकार के बादल
घुमड़ - घुमड़
हवा के साथ - साथ
गलबहियां शुरु कर देते हैं
सार्थक विचार
खुद को समेटना शुरू कर देते हैं
ठीक वैसे ही
जैसे
कछुआ विपरीत समय में
सही अवसर के इन्तजार में
समेट लेता है अपने - आपको ।
शब्द आते ही
सायास
दिलो -दिमाग के किसी कोने में
अहंकार के बादल
घुमड़ - घुमड़
हवा के साथ - साथ
गलबहियां शुरु कर देते हैं
सार्थक विचार
खुद को समेटना शुरू कर देते हैं
ठीक वैसे ही
जैसे
कछुआ विपरीत समय में
सही अवसर के इन्तजार में
समेट लेता है अपने - आपको ।
Tuesday, October 13, 2009
आओ ! बातें करें.....
आओ ! बातें करें
आज क्यों नहीं है सुख-शान्ति ?
आओ ! बातें करें
कितना अस्त-व्यस्त है जन-जीवन ?
आओ ! बातें करें
इतना क्यों हाहाकार मचा है ?
आओ ! बातें करें
अरमानों ने क्यों दम तोड़ा है ?
आओ ! बातें करें
इन्तजार की घड़ी इतनी लम्बी क्यों है ?
आओ ! बातें करें
दरस को प्यासे नयन क्यों हैं ?
आओ ! बातें करें.....!
आज क्यों नहीं है सुख-शान्ति ?
आओ ! बातें करें
कितना अस्त-व्यस्त है जन-जीवन ?
आओ ! बातें करें
इतना क्यों हाहाकार मचा है ?
आओ ! बातें करें
अरमानों ने क्यों दम तोड़ा है ?
आओ ! बातें करें
इन्तजार की घड़ी इतनी लम्बी क्यों है ?
आओ ! बातें करें
दरस को प्यासे नयन क्यों हैं ?
आओ ! बातें करें.....!
Thursday, October 1, 2009
अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल.......!
कहते हैं
गत कर्मों का फल
यहीं मिला करता है
शायद यह सच भी है !
प्रकृति बार बार
सचेत कराती है
आओ !
अपने साथ हो रहे घटित से
सबक लो....!
अहंकार में मदमस्त मानव
अर्थ और काम में मस्त हो
खुद को लुटते देखकर भी
होश में जाने कब आये
क्या पता........?
उसे संजीवनी तो बस
अर्थ ही है
अर्थ का हांथ से फिसलना
अपने समानधर्मी गति से हो
यह
सार्थक अर्थों वाली होती है
और जब यही फिसलन
असमानधर्मी हो जाय
सारे समीकरण पल भर में बदल जाते हैं ।
फिर
अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल
कितना रह जाता है....!
गत कर्मों का फल
यहीं मिला करता है
शायद यह सच भी है !
प्रकृति बार बार
सचेत कराती है
आओ !
अपने साथ हो रहे घटित से
सबक लो....!
अहंकार में मदमस्त मानव
अर्थ और काम में मस्त हो
खुद को लुटते देखकर भी
होश में जाने कब आये
क्या पता........?
उसे संजीवनी तो बस
अर्थ ही है
अर्थ का हांथ से फिसलना
अपने समानधर्मी गति से हो
यह
सार्थक अर्थों वाली होती है
और जब यही फिसलन
असमानधर्मी हो जाय
सारे समीकरण पल भर में बदल जाते हैं ।
फिर
अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल
कितना रह जाता है....!
Monday, September 28, 2009
राम-राज्य की परिकल्पना .....!
विजयादशमी
आश्विन शुक्ल की दशमी
अपने अमरत्व को लेकर
सदियों से इतरा रही होगी.....!
भगवान राम के
अधर्म पर धर्म की
असत्य पर सत्य की विजय
और
गृह-नगर-आगमन का श्रेय
मुझे ही मिला !
जायज भी है
जिसके हिस्से
लग जाय इतना बड़ा श्रेय
वह अपने आगत को लेकर भी
सुनिश्चित होगा ही...!
मनाना विजयादशमी को
उचित है
राम रावण युद्ध और राम की विजय
एक बड़े जनसैलाब के समक्ष मंचन
आमंत्रण है हमें कि
जीवन में सत्य के मार्ग पर
सदैव ही चलकर
सही संस्थापना होती है !
सदियों से चले आ रहे
इस पर्व का प्रभाव
जनसामान्य में
सार्थक हुआ होता
राम-राज्य की परिकल्पना
साकार नहीं होती....!
आश्विन शुक्ल की दशमी
अपने अमरत्व को लेकर
सदियों से इतरा रही होगी.....!
भगवान राम के
अधर्म पर धर्म की
असत्य पर सत्य की विजय
और
गृह-नगर-आगमन का श्रेय
मुझे ही मिला !
जायज भी है
जिसके हिस्से
लग जाय इतना बड़ा श्रेय
वह अपने आगत को लेकर भी
सुनिश्चित होगा ही...!
मनाना विजयादशमी को
उचित है
राम रावण युद्ध और राम की विजय
एक बड़े जनसैलाब के समक्ष मंचन
आमंत्रण है हमें कि
जीवन में सत्य के मार्ग पर
सदैव ही चलकर
सही संस्थापना होती है !
सदियों से चले आ रहे
इस पर्व का प्रभाव
जनसामान्य में
सार्थक हुआ होता
राम-राज्य की परिकल्पना
साकार नहीं होती....!
Monday, September 21, 2009
झंकृत स्वर....!
झंकृत स्वर
गुंजायमान हो उठा
एक बार फिर
लम्बे अन्तराल के बाद ।
तुम ठीक उसी तरह आज भी दिखे थे
सादगी के आभूषण
आज भी सुशोभित हो रहे थे
आत्मविश्वास से भरा देख
प्रमुदित हो रहा था मैं ।
तुम्हारा झल्लाना
अब
मधुर मुस्कान में
तब्दील चुका था...!
शारदीय नवरात्रि में
संयोगात अलग - अलग पंक्ति में
साथ ही आशीर्वाद जैसे
वर्षों से चली आ रही परंपरा
सी हो गयी हो...!
ठीक उसी सिद्धान्त की तरह
जैसे-
"आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब
तीनो एक ही बिन्दु पर होते हैं ।"
समय की गति ने रफ्तार ली
लेकिन
हम दोनों वैसे ही हैं
जैसे होते हैं नदी के किनारे
जिन्हें नहीं होना साथ साथ
बस लहरें हैं प्रेम की
जिससे होता है भावास्पर्श
हमारा - तुम्हारा...!
गुंजायमान हो उठा
एक बार फिर
लम्बे अन्तराल के बाद ।
तुम ठीक उसी तरह आज भी दिखे थे
सादगी के आभूषण
आज भी सुशोभित हो रहे थे
आत्मविश्वास से भरा देख
प्रमुदित हो रहा था मैं ।
तुम्हारा झल्लाना
अब
मधुर मुस्कान में
तब्दील चुका था...!
शारदीय नवरात्रि में
संयोगात अलग - अलग पंक्ति में
साथ ही आशीर्वाद जैसे
वर्षों से चली आ रही परंपरा
सी हो गयी हो...!
ठीक उसी सिद्धान्त की तरह
जैसे-
"आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब
तीनो एक ही बिन्दु पर होते हैं ।"
समय की गति ने रफ्तार ली
लेकिन
हम दोनों वैसे ही हैं
जैसे होते हैं नदी के किनारे
जिन्हें नहीं होना साथ साथ
बस लहरें हैं प्रेम की
जिससे होता है भावास्पर्श
हमारा - तुम्हारा...!
Sunday, September 20, 2009
कलुषित हो जाता है मन....!
कलुषित हो जाता है मन
दिन ब दिन
प्रवंचनाएं नये रंग ला रही हैं
जब भी कुछ नया करने को सोचता है मानव ।
जाने क्यों
सींखचों में जकड़ा सा पाता है
जब भी विचारधाराएं
पंख पसार उड़ना चाहती हैं
लगता है जैसे
पहले से ही कोई जाल बिछाये है ।
राहों के दरवाजों पर
सांकले लगा दिये जाते हैं
घुट कर दम तोड़ देना
जैसे नीयति सी हो गयी है ।
बार बार यही सुनना
कथित संभ्रांत लोगों से
अरे नहीं!
यह हमारी परंपराओं के खिलाफ है
इस भाव का प्रतिध्वनित होना
धुधले आवरण में
ढंक लेता है ।
क्या इन अतृप्त आत्माओं से
साहचर्य दे पायेगा उचित दृष्टिकोंण....!
दिन ब दिन
प्रवंचनाएं नये रंग ला रही हैं
जब भी कुछ नया करने को सोचता है मानव ।
जाने क्यों
सींखचों में जकड़ा सा पाता है
जब भी विचारधाराएं
पंख पसार उड़ना चाहती हैं
लगता है जैसे
पहले से ही कोई जाल बिछाये है ।
राहों के दरवाजों पर
सांकले लगा दिये जाते हैं
घुट कर दम तोड़ देना
जैसे नीयति सी हो गयी है ।
बार बार यही सुनना
कथित संभ्रांत लोगों से
अरे नहीं!
यह हमारी परंपराओं के खिलाफ है
इस भाव का प्रतिध्वनित होना
धुधले आवरण में
ढंक लेता है ।
क्या इन अतृप्त आत्माओं से
साहचर्य दे पायेगा उचित दृष्टिकोंण....!
Thursday, September 10, 2009
आज तुम यहां होते ..!
आजकल हर लम्हा
सवाल पूछता है
कितने बदल गये हो तुम
समय ऐसा करवट लेगा
तुम्हारे जीवन से
अवकाश के क्षण
भी बार- बार पुकार कर
अपना हक मांगेंगे
और तुम उन्हें क्या दे सकोगे ।
पिछले पायदान के पदचिह्न
साथ गुजरे एक-एक पल
का हिसाब करने को बेकरार हैं
कहते हैं
अरे ! मैने ही साथ दिया था
उस वक्त जब तुम्हारी
अपनी कोई पहचान न थी
कदम - कदम पर हौसला दिया
और बेहतर संयोग भी
नहीं होता न्याय तुम्हारे साथ
आज तुम यहां होते ........!
सवाल पूछता है
कितने बदल गये हो तुम
समय ऐसा करवट लेगा
तुम्हारे जीवन से
अवकाश के क्षण
भी बार- बार पुकार कर
अपना हक मांगेंगे
और तुम उन्हें क्या दे सकोगे ।
पिछले पायदान के पदचिह्न
साथ गुजरे एक-एक पल
का हिसाब करने को बेकरार हैं
कहते हैं
अरे ! मैने ही साथ दिया था
उस वक्त जब तुम्हारी
अपनी कोई पहचान न थी
कदम - कदम पर हौसला दिया
और बेहतर संयोग भी
नहीं होता न्याय तुम्हारे साथ
आज तुम यहां होते ........!
Tuesday, September 8, 2009
पारदर्शिता - अपारदर्शिता के बीच.......!
बावरा मन
बड़ा भोला है
नहीं रखता याद
उसके साथ क्या घटित हुआ...।
नहीं पड़ा इसके पचड़े में
संभव है दूरदर्शी हो
दुनियां के मकड़जाल का क्या पता इसे
अतीत का सुख-दुख
और वर्तमान में सहभागी बन कर
सच को बार- बार परेशान देखकर भी
अपना धैर्य नहीं खोता
किसी की निष्ठुरता पर
बयानबाजी नहीं करता |
दूरदर्शिता की पराकाष्ठा
अपने समस्त अर्थों में विद्यमान है यहां
सारे चिन्तन से परे
अजीब दुनियां बसती है......!
चुक जाते हैं गणित के भेद
पारदर्शिता - अपारदर्शिता के बीच.......!
बड़ा भोला है
नहीं रखता याद
उसके साथ क्या घटित हुआ...।
नहीं पड़ा इसके पचड़े में
संभव है दूरदर्शी हो
दुनियां के मकड़जाल का क्या पता इसे
अतीत का सुख-दुख
और वर्तमान में सहभागी बन कर
सच को बार- बार परेशान देखकर भी
अपना धैर्य नहीं खोता
किसी की निष्ठुरता पर
बयानबाजी नहीं करता |
दूरदर्शिता की पराकाष्ठा
अपने समस्त अर्थों में विद्यमान है यहां
सारे चिन्तन से परे
अजीब दुनियां बसती है......!
चुक जाते हैं गणित के भेद
पारदर्शिता - अपारदर्शिता के बीच.......!
Friday, August 21, 2009
विचार
विचार
मुखरित हो उठते हैं
भाषा में भी जान आ जाती है
मस्तक भी हो जाता है तेजमय
जब
आप हो जांय
कर्तव्यनिष्ठ
और फिर
जीवन
सुखमय
शान्तिमय
भेदभाव रहित हो जाता है.....!
मुखरित हो उठते हैं
भाषा में भी जान आ जाती है
मस्तक भी हो जाता है तेजमय
जब
आप हो जांय
कर्तव्यनिष्ठ
और फिर
जीवन
सुखमय
शान्तिमय
भेदभाव रहित हो जाता है.....!
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