कलरव
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Tuesday, August 18, 2009
बांधो न नाव इस ठांव बन्धु!
सूर्यकांत
त्रिपाठी
"
निराला
"
की
कविता
बांधो
न नाव इस ठाँव बन्धु!
पूछेगा सारा गाँव बंन्धु!
यह घाट वही जिसपर हँस कर,
वह कभी नहाती थी हँसकर,
आंखें रह जाती थी फँसकर,
कंपते थे दोनों पाँव,बन्धु!
वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
देती थी सबको दाँव,बन्धु!
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