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Tuesday, October 6, 2009

हां सर्वस्व मेरे.......!

सर्वस्व मेरे !
तम छंटा..
हूं मैं तुम्हारे
आलोक में ।

क्या है ...
निजशेष
उठा लिया है अपनी गोद में
तुम्हारी दृष्टि का सावन
मुसलाधार है या मद्धम
ज्ञात अब क्या बचा है ।

तुम्हारे आशीर्वचनों ने
समूचे दुःखों को हर लिया ...!

हां सर्वस्व मेरे.....!