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Sunday, September 20, 2009

कलुषित हो जाता है मन....!

कलुषित हो जाता है मन
दिन ब दिन
प्रवंचनाएं नये रंग ला रही हैं
जब भी कुछ नया करने को सोचता है मानव ।

जाने क्यों
सींखचों में जकड़ा सा पाता है
जब भी विचारधाराएं
पंख पसार उड़ना चाहती हैं
लगता है जैसे
पहले से ही कोई जाल बिछाये है ।

राहों के दरवाजों पर
सांकले लगा दिये जाते हैं
घुट कर दम तोड़ देना
जैसे नीयति सी हो गयी है ।

बार बार यही सुनना
कथित संभ्रांत लोगों से
अरे नहीं!
यह हमारी परंपराओं के खिलाफ है
इस भाव का प्रतिध्वनित होना
धुधले आवरण में
ढंक लेता है ।

क्या इन अतृप्त आत्माओं से
साहचर्य दे पायेगा उचित दृष्टिकोंण....!

Thursday, September 17, 2009

दांव - पेच से दूर होता है बचपन...!

दांव - पेच से दूर होता है बचपन
नहीं फिकर कहां क्या हो रहा है
जो सामने है
वही अपनी दुनिया है |

उसे क्या पता
बुद्धि बड़े रंग दिखाती है
अपने - पराये , हमारा - तुम्हारा
और भी बहुत कुछ |

खेल - कूद में गुस्सम - गुस्सा
लम्बी अवधि का नहीं होता
यहां अभिमान टकराता ही नहीं
इसी लिये मेल - मिलाप में देरी नहीं होती |

आज हम युवा हैं
बडी़ कूटनीति से रहना हमारा धर्म सा हो गया है
न हों आप ऐसे
सामाजिक मोह पास
आपको अपने निमित्त बना कर रख देगा
जीवन के उस मोड़ पर
जब आप अपनी दिशा निर्धारण कर रहे होते हैं |

यही लोग जो आज पसंद कर रहे हैं
आने वाले समय में
स्थापित नहीं किया खुद को
निन्दा करते देर नहीं लगती
अरे...!
कुछ नही कर रहे हो ....!