उस व्यक्ति के लिये जिसका कोई स्थानापन्न नहीं मेरे जीवन में ---
आदर्श चुक जाता है वहाँ, विचार झनझनाने लगते हैं । चिन्तना कुछ मुखरित हो अपने सम्पूर्ण स्वरूप में संकलित होने लगती है । दृष्टि उलझने लगती है - कुछ अनचीन्हें, कुछ अनजाने या फिर अन्तर्निहित तत्वों से । दिखायी देता है कभीं यथार्थ तो कभी स्वप्न तो कहीं-कभीं जीवन दर्शन भी । विकसित होते है पत्र कुछ स्नेह के तो आक्रोश भी बड़ा सजग खिलने की चेष्टा में रहता है उत्सुक । फिर भी दिखायी दे जाती है चिन्तारहित मुस्कान , मुस्कान ही नहीं हँसी जो है निश्चिंतता का विश्वास ।
मनुष्यता का वरदान यदि कुछ है तो क्या ? जीवन ! केवल जीवन । जीवन का आधार क्या - सरसता । सरसता के लिये आवश्यक है भाव, स्नेह, और प्रेम ।
वहाँ भाव की प्रवणता है, उसका पारखीपन नहीं । वहाँ स्नेह की शीतलता है परन्तु अतृप्त व्यामोह के साथ । वहाँ प्रेम भी है पर उसका विस्तार नहीं , वह केवल एक संज्ञान है । मनुष्यता तो हावी है उनपर, मगर कुछ भटकती, बिलखती और खोजती अपना ही स्थान । वहाँ जीवन की सरसता भी देखी है मैंने - संवेदी, शंकित, अवगुंठित ।
इनके कुछ होने और इनके कुछ कर देने में अन्तर है । इनका कुछ होना इनकी दृष्टि में कुछ भी नहीं । हाँ, इनका कुछ कर देना एक विशिष्ट अर्थ रखता है । इन्होंने अपने व्यक्तित्व की ऊर्जा भी शायद अपने कार्यों में लगा दी । चतुर हैं, जानते हैं कि व्यक्ति के कार्य उसके व्यक्तित्व के निर्धारक हैं । शायद इसीलिये महत्व कुछ कर देने का है इनके लिये, होने का नहीं ।
उनके लिये कार्य का महत्व है , महत्व का कार्य नहीं । कौन खाली है जो महत्व के कार्य की खोजबीन में समय गँवाए । किसने सोची हैं परिस्थितियाँ जो महत्व के कार्यों का निर्धारण कर सकें । इनके कार्य का महत्व है । कार्य पहले महत्व बाद में । पहला व्यक्तित्व है जिसने शरीर को आत्मा के बिना गतिशील रखा है ।