Wednesday, November 11, 2009

कितना उचित है....?

अपने ही देश में
राष्ट्र-भाषा की अवहेलना
करने को आतुर होना
कितना उचित है....?

यह ठीक है
हर प्रान्त की अपनी
आंचलिक भाषा हो
बात समझ में आती है
पर
काम-काज में
हिन्दी अपनाने से भागना
कहीं से उचित है भला...।

हिन्दी की स्थापना से आशय
यह कदापि नहीं कि
आपकी आंचलिक भाषा को
उपेक्षित किया जा रहा है....।

बार-बार अपने होने का बिगुल फूकना
बुद्धिमत्ता का परिचायक कहां से है..
राष्ट्र-भाषा की सशक्त उपस्थिति को
कैसे खण्डित कर सकता है कोई.....?

ऐसा करना
अपने आपको
टुकड़ों में बांटने जैसा है.....।

7 comments:

Udan Tashtari said...

सत्य वचन!!

राष्ट्र-भाषा की अवहेलना-शर्मनाक!!!

Arvind Mishra said...

ठीक बात मगर इसे सुने कौन है ?

वाणी गीत said...

अनुचित ही है ...!!

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

भैया, हिन्दी की हिन्दी तो हिन्दी भाषियों ने ज्यादा की है। :-)

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

JHAROKHA said...

सच कहा है आपने।

अर्शिया said...

आपका कहना उचित है, किन्तु टुच्चों के लिए अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि होता है।
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11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?