Sunday, November 22, 2009

जब जब उठने का अवसर मिला

जब जब उठने का अवसर मिला
धड़ाम से गिरा दिया जाता हूँ मैं
कभी प्रकृति
कभी नियति
कभी किसी बड़ी बीमारी का
आकस्मिक अटैक
कि झट से उबर भी न सको

असर पड़त्ता है मनोदशा पर
रुटीन इकोनोमी पर
अपनों पर
जुड़े शुभेक्षुओं पर ।
सुबह से शाम तक सरकती
जिन्दगी
रात को आराम ले
फिर आ खड़ी होती है कमर कसके
हर क्षणका  सामना डट के करने को

इस चल रही निरन्तर प्रक्रिया में
शरीर के साथ ही  मनोदशा की भी
जम के परीक्षा हो जाती है
आखिर कब तक लगातार
परीक्षा में पास होता रहेगा
शरीर, फिर मनोदशा

चुकना भि तो है नियति
सो स्वभावतः
बीमारी का निशाना बन पड़ा
अब तक जो भी पाने में
बिना खयाल किये
खटाया था
चलो अब जुर्माना दो

जब प्रकृति संतुलन पर आधारित है
देह-धर्म कैसे अलग हो सकता है भला .... ।

9 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

मैंने तुम्हें कविता लिखने की तमीज सिखलानी चाही थी-यद्यपि जानता खुद भी नहीं था -आज सोचता हूँ वह तमीज किस काम की - तुम कह्ते थे कविता के मामले में बद्तमीज हो - यही सही । जब सब कुछ अभिव्यक्त हो ही रहा है, सहज ही कविता बन रही है ।

इन पंक्तियों ने ठहरा दिया -
"अब तक जो भी पाने में
बिना खयाल किये
खटाया था-
चलो अब जुर्माना दो"

Jai Prakash Chaurasia said...

भाई,बीमारी हर तरह से परेशान करती है आप ठीक होकर अच्छे से अपना ब्लाग लिखें यही कामना है।

Jai Prakash Chaurasia said...

उम्मीद है अब प्रकृति से संतुलन बनाकर चलेंगें।

वाणी गीत said...

चलो अब जुर्माना दो

जब प्रकृति संतुलन पर आधारित है
देह-धर्म कैसे अलग हो सकता है भला .... ।

लम्बे अन्तराल के बाद लिखी गयी आपकी इस कविता ने मेरे मनोभावों को भी जबान दे दी है ...यही जीवन है ...एक पल आशा ...एक पल निराशा ...
अस्वस्थता के बीच सकारत्मक विचार मदद करते है ...शारीरिक और मानसिक अवस्था को दुरुस्त करने में ...शुभ हो ...शुभकामनायें ...!!

Arvind Mishra said...

जल्दी ठीक होईये -शुभकामनाएं !

शरद कोकास said...

deha dharma kaa nirvaaha to karana hee hai |

JHAROKHA said...

अच्छी रचना---सुन्दर शब्दों में----।

creativekona said...

एक मनःस्थिति को बड़ी सहजता के साथ कवित में उकेरा है आपने। अच्छी रचना।
हेमन्त कुमार

राजेश बुढाथोकी 'नताम्स' said...

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