Wednesday, November 4, 2009

कहीं यह मेरे पैरों से.....


राह पर चलता हुआ आदमी
निहार रहा है
राह के कंकड़ों को
जिसने कितनों से  खाया होगा
ठोकर
उसकी ओट में
जा दुबकती चींटी को
यह समझ कर कि
कहीं यह मेरे पैरों से
दबने के डर से
ही नहीं जा चिपकी है
उसकी ओट से
नन्हीं सी जान
जिसे बोध है
जीवन मरण का
आज
आदमी
महत्वाकांक्षा की होड़ में
खुद को भूलता जा रहा है
रास - रंग व भौतिकता से अवकाश
शायद
उसके अपने बस की बात नहीं !

9 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

सुन्दर कविता !

वाणी गीत said...

राग रंग और भौतिकता से प्रभावित हुए बिना महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं ...वर्तमान को सहजता से प्रकट करती हुई कविता ..!!

वन्दना said...

bahut hi sahi baat aur bahut hi sanyat shabdon mein kahi.

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

महत्वाकांक्षा नहीं है गलत। पर स्वयं को भूलना और अपने को अपने नियंत्रण से छोड़ देना अपराध है जो हम उतरोत्तर अधिक करने लगे हैं!

Mishra Pankaj said...

चलो खुशी मिली आप वापस आये ..अब ये बताइए नेट सही हुआ या कही और से

Udan Tashtari said...

एक बहुत सुन्दर कविता.

Dhiraj Shah said...

सुन्दर रचना...

Aarjav said...

उसके अपने बस की बात नहीं ! हां , बात तो अपने बस की नहीं है …….बहुत सारी चीजों के निर्धारक न चाहते हुये भी दूसरे हो गये हैं !

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com