Saturday, January 30, 2010

तरलता से ही जुड़ते तुम..

तुम नहीं हो
यह अनुभव
नयन सजल कर देता है,
तुम्हारा होना भी
आँखे भर देता है ।

तरलता से ही जुड़ते तुम
हर कहीं, कभीं भी ।

10 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन!!

निर्मला कपिला said...

बहुत खूब धन्यवाद

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

हिमांशु । Himanshu said...

शब्द तो कम हैं, अनुभूति बड़ी है ।
तरलता सदैव ही तुम्हें आप्लावित करती है, आतंकित भी !
सम्हल कर रहो !
धन्यवाद ।

वन्दना said...

badi gahri baat kah di........sara adhyatm hi utaar diya chand shabdon mein.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

तरलता वाष्पित भी होती है। ठोस-तरल-विरल, सभी आंतरिक अनुभूतियां हैं।
आप बहुत बढ़िया लिखते हैं बन्धु।

वाणी गीत said...

तरलता रिश्तों को बांधती है ...पूर्ण भी करती है ...और कभी कभी दूर भी ....!!

'अदा' said...

कभी पढ़ा था द्रव्य अपना रास्ता स्वयं ढूंढ लेते हैं...यहाँ तक कि रिश्ते भी...
सुन्दर ..नहीं....अतिसुन्दर..!!
आभार...

sandhyagupta said...

Kya baat hai.Bahut sundar.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गागर में सागर।
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घूँघट में रहने वाली इतिहास बनाने निकली हैं।
खाने पीने में लोग इतने पीछे हैं, पता नहीं था।