Friday, September 17, 2010

बाबा सारंगी वाले

अब नहीं आते बाबा
सारंगी वाले
बचपन में
दादी
दिया करती थी
भर पेट भोजन
और
साथ में ढेर सारा दान
प्रसन्न हो
बाबा सुनाते थे --
बदले में
कई निर्गुण..!
हम सब बच्चों की टोली
जमा हो जाती थी उनके आस-पास
हम सभी
बस इतना ही जानते थे
बाबा हैं तो
राम धुन ही गायेंगे....!

अब न दादी रहीं, न दादी का दान, 
समय की करवट ने
छीन लिया बाबा, निर्गुण, रामधुन को ।

तो
अब नहीं आते
बाबा सारंगी वाले....!

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

भावुक रचना।

वाणी गीत said...

अच्छी कविता ..!

पद्म सिंह said...

आपने बचपन की यादें ताज़ा कर दीं ... सारंगी पर निर्गुण सुनना बहुत मोहक अनुभव होता था ... गेरुआ कपड़ों में द्वार द्वार निर्गुण गाते बाबा किसी भंडारे के लिए दान लेते थे... और इतने मोहक और अर्थपूर्ण गीत गाते कि हम कई बार उनके पीछे पीछे कई घरों तक जाते ... सच सब कुछ ताज़ा हो गया .. बहुत आभार आपका

Himanshu said...

कुछ चरित्र संवेदना के अंतिम स्तरों तक पहुँचते हैं, यद्यपि होते हैं नितान्त अपरिचित...पर बिलकुल जाने पहचाने, सदैव उपस्थित-से हम बनाते, सँवारते रह्ते हैं।
बाबा सारंगी वाले आपकी भावुक, संवेदित आत्मीय प्रतिक्रिया है ।

JHAROKHA said...

बचपन की यादों के साथ एक युग को --समय को संजोती रचना।

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

बेहतरीन रचना---आपके बचपन से जुड़े प्रसंगों को अभिव्यक्त करती हुयी।

AMOD PRAKASH CHATURVEDI said...

nice

AMOD PRAKASH CHATURVEDI said...

good

AMOD PRAKASH CHATURVEDI said...

बरजोरी ले आये बचपन की ओर । जोगिया रंग में जोगी बाबा । सरङी और तुमड़ी । गर्मियो के दिन , दोपहर का समय । सरङी की आवाज । राग सारंग से सर्वथा मुक्त (अब सोचता हूँ ) । कुछ लोग डराते भी थे’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’ लकड़सुंघवाँ है , पकड़ ले जायेगा ।