
प्रत्याशित सफलता का न होना
नीयति पर ठीकरा कसना क्यों हो...?
कहीं यह पलायन तो नहीं...!
इसकी समीक्षा
ठंडे बस्ते में डाल देती है
गर्म लोहे के ताप को
असफलता से प्राप्त
आग की ज्वाला
यदि सच्ची है
फिर
तपा कर स्वयं को
कुन्दन न बना देगी....!
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11comments:
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बहुत गहरी बातें बता जाती है किसी विशेष क्षण की असफलता ! कुन्दन ही बनाती है । प्रवृत्ति सही है । चरैवेति...चरैवेति..!
@
गर्म लोहे के ताप को
असफलता से प्राप्त
आग की ज्वाला
यदि सच्ची है
फिर
तपा कर स्वयं को
कुन्दन न बना देगी....!
इसे रीफ्रेम कीजिए बन्धु ! निखार की दरकार है। शानदारी पर थोड़ी सान चढ़ा दीजिए।
आशा का सन्देश है आपकी कविता ...!!
यदि सच्ची है
फिर
तपा कर स्वयं को
कुन्दन न बना देगी... इन पंक्तियों में तो आपने जीवन का एक बड़ा दर्शन बता दिया है---सुन्दर ।
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