Tuesday, September 29, 2009

खिड़की से आकाश ......!

खिड़की से आकाश
अपने सीमित फलक वाला दिखता है
क्षितिज का भी अपना पता नहीं
यह बोध कब होगा...!

ऐसा क्यों होता है
कमरे में बैठ कर
सामान्य चर्चाओं में नुक्ताचीनी
आकाश ऐसा है
आकाश वैसा है
खुद को आवरण में रखकर
बेहतर अभिव्यक्ति की अपेक्षा संभव है....?

किसी भी विचार अभिव्यक्ति के पीछे
देश,काल,वातावरण के अनुसार
काल,पात्र,विवेचन
प्रभावित होता रहा है ।

आकाश के विस्तृत फलक को
खुले मैदान में आकर ही
अनुभव किया जा सकता है
कि यह अपने आवरण में सर्वस्व समेटे हुए हैं ।

क्षितिज की परिधि में
आमूल-चूल रूप में
एक छोटी सी दुनियां है
जिसमें अपना संसार बसता है
और
इसके पार कल्पनालोकी दुनियां....!

Monday, September 28, 2009

राम-राज्य की परिकल्पना .....!

विजयादशमी
आश्विन शुक्ल की दशमी
अपने अमरत्व को लेकर
सदियों से इतरा रही होगी.....!

भगवान राम के
अधर्म पर धर्म की
असत्य पर सत्य की विजय
और
गृह-नगर-आगमन का श्रेय
मुझे ही मिला !

जायज भी है
जिसके हिस्से
लग जाय इतना बड़ा श्रेय
वह अपने आगत को लेकर भी
सुनिश्चित होगा ही...!

मनाना विजयादशमी को
उचित है
राम रावण युद्ध और राम की विजय
एक बड़े जनसैलाब के समक्ष मंचन
आमंत्रण है हमें कि
जीवन में सत्य के मार्ग पर
सदैव ही चलकर
सही संस्थापना होती है !

सदियों से चले आ रहे
इस पर्व का प्रभाव
जनसामान्य में
सार्थक हुआ होता
राम-राज्य की परिकल्पना
साकार नहीं होती....!

Saturday, September 26, 2009

हाईकू.....!

भोर हुआ धरती पर
"मानस"
जाग उठा ..!


तुम न थे
पर
तुम्हारी याद साथ - साथ थी..!


तुमसे रूखसत हुआ
तो
होश आया..!


स्वप्न
सलोना हो
तेरे जैसा..!

बचपन का
भोलापन
यहां ईश्वर बसता है..!

Friday, September 25, 2009

बादल मंडरा रहे हैं...!

बादल मंडरा रहे हैं
खुशियों के
जाने कब बरस जांय
कर दें सराबोर
इस पूरे आभामंडल को ।

रोम रोम हो जाय
पुलकित
तुम्हारे आने की
तमन्नाओं का सफर
जल्द ही रंग लायेगा ।

ऐसा लगता है
मंजिल अपनी ओर
सायास ही
रंग बिरंगे स्वप्न लिये
आकर्षित कर रही है ।

तुम साथ हो तभी
सारी खुशियों की रवानी है
आ जाओ जब
सब कुछ बेहतर सा दिखने लगता है-
सुबह खिली खिली सी..
शाम रंगीन और भी बहुत कुछ..!

साथ ही मूल्यांकन करता हूं जब
हर रात सोने से पहले
दिन भर का
हर क्षण मूल्यवान सा दिखता है ।

Wednesday, September 23, 2009

फूल जाते हैं हांथ पांव.....!

दिन -ब - दिन
समस्याएं साथ नहीं छोड़ रहीं
इस जंजाल से मुक्ति पाने का
अनूठा मार्ग है
समस्या के साथ ही साथ ।

जितनी गहरी समस्या
उतनी मोटी रकम
घूस के रूप में
समस्या हल हो जायगी
बिना किसी योग्यता के ।

मोटी रकम से निर्धारित मानक
क्षण भर मे
सारे मानक खुद - ब - खुद
पूरे हो जाते हैं...!
और हो जाते हैं सफल ।

कुछ लोग !
देखते रह जाते हैं वह
जो जानते हैं उनकी वास्तविकता
हांथ पर हांथ धरे रह जाना
बन जाती है उनकी नीयति...!

देख कर यह सब
फूल जाते हैं हांथ पांव
हृदय में चलने लगते हैं घूंसे
धाड़ - धाड़ बजने लगता है वह ।

क्या मेरी सारी ऊर्जा
जो लगा दी मैने
एकेडमिक रिकार्ड बनाने में
उसका कोई मोल नहीं
क्योंकि नही दे सकता मैं
इतना सारा घूस .....।

Tuesday, September 22, 2009

कौन कहे जा करके - उस मां से .....!

दुर्घटनाए
जानलेवा न हों
ढाढस बाधा जाना ...!
बात समाझ में आती है ।

हाईवे पर छः घण्टे के अन्दर
छः छः मौतों ने
हिला कर रख दिया
सड़क पर वही चल रहे होते हैं
जिनसे न जाने कितनों के
अरमान जुड़े होते हैं ।

किसी मां ने लगाया होगा तिलक
जा बेटा ! तुझे आज अवश्य मिलेगी सफलता
बगल में परदे से झांक रही पत्नी
कितने अरमानों से की होगी मंगल कामना
हे ईश्वर ! अब हमारा चमन भी खिल उठे
चौखट पर खेल रही बिटिया ने देखा होगा.....!
अबकी पापा रेलगाड़ी जरूर ला देंगे
खूब चलाउंगी मै

कौन कहे जा करके
मां से !
पत्नी से ! और
उस नन्हीं सी बिटिया से ।

और कैसे ?
कि तुम्हारा ........!

अनायास, असमय, अकारण
हंसी अच्छी नहीं लगती....!

फिर यह मौत....?

Monday, September 21, 2009

झंकृत स्वर....!

झंकृत स्वर
गुंजायमान हो उठा
एक बार फिर
लम्बे अन्तराल के बाद ।

तुम ठीक उसी तरह आज भी दिखे थे
सादगी के आभूषण
आज भी सुशोभित हो रहे थे
आत्मविश्वास से भरा देख
प्रमुदित हो रहा था मैं ।

तुम्हारा झल्लाना
अब
मधुर मुस्कान में
तब्दील चुका था...!

शारदीय नवरात्रि में
संयोगात अलग - अलग पंक्ति में
साथ ही आशीर्वाद जैसे
वर्षों से चली आ रही परंपरा
सी हो गयी हो...!

ठीक उसी सिद्धान्त की तरह
जैसे-
"आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब
तीनो एक ही बिन्दु पर होते हैं ।"

समय की गति ने रफ्तार ली
लेकिन
हम दोनों वैसे ही हैं
जैसे होते हैं नदी के किनारे
जिन्हें नहीं होना साथ साथ
बस लहरें हैं प्रेम की
जिससे होता है भावास्पर्श
हमारा - तुम्हारा...!