अकल्पनीय
घटनाओं का घटित होना
विस्मयकारी अनुभव लेकर आता है
इसके पीछे नियति का खेल
किस सीमा तक है ...?
मानस पटल पर
स्वतः दृश्यावलियां उद्भूत हो जाती है
अंकित करना न चाहते हुए भी
बच नहीं सकता है कोई ।
विलक्षणता पांव पसारने लगती है
उसके शब्दकोश में
गतिरोध जैसा शब्द नहीं
पल भर में
स्नेह निर्झर उन्मुक्त हो
स्निग्धता लिए हुए
काव्यालोक से होते हुए
मंत्रमुग्ध कर देती हैं ।
घनीभूत पीड़ा काफूर हो जाती है
उस स्वप्नलोकी दुनियां में
जहां कोई अपने पराये का भेद नहीं.....!
Monday, September 7, 2009
Sunday, September 6, 2009
अभी जीना है...!
मुझे अभी जीना है कविता के लिए नहीं
कुछ करने के लिए कि मेरी संतान मौत कुत्ते की न मरे
मै आत्महत्या के पक्ष में नहीं हूं तो इसलिए
कि मुझसे पहले मरें वे जो कि
मेरी तरह मरने को बाध्य हैं
कुछ नहीं करता हूं मृत्यु के भय से मैं
सिर्फ अपमान से उनको बचाता हूं
जिन्हें मृत्यु आकर ले जायगी
दबे पांव आहट को सुनता हूं
और उसे शोर बनने नहीं देता हूं
हां मैं कुछ करता हूं जिसका
उपचार से कोई संबंध नहीं
(‘रघुवीर सहाय‘ की कविता)
कुछ करने के लिए कि मेरी संतान मौत कुत्ते की न मरे
मै आत्महत्या के पक्ष में नहीं हूं तो इसलिए
कि मुझसे पहले मरें वे जो कि
मेरी तरह मरने को बाध्य हैं
कुछ नहीं करता हूं मृत्यु के भय से मैं
सिर्फ अपमान से उनको बचाता हूं
जिन्हें मृत्यु आकर ले जायगी
दबे पांव आहट को सुनता हूं
और उसे शोर बनने नहीं देता हूं
हां मैं कुछ करता हूं जिसका
उपचार से कोई संबंध नहीं
(‘रघुवीर सहाय‘ की कविता)
Saturday, September 5, 2009
शिक्षक दिवस पर..
शिक्षक दिवस पर...
एक पत्र उन शिक्षकों के नाम
जिन्हों ने जहां को रोशन करने में
अपना सब कुछ लुटा दिया ।
परम आदरणीय,
सादर...!
आपके योगदान को
कैसे भूलेगा यह संसार ?
क्या आपको एक दिवस ही काफी है ?
जब पुरस्कृत होता है छात्र
उसके पार्श्व में और कौन है
आपके सिवाय,
किसे मिलता है पुरस्कार,
कौन होता है हर्षातिरेक से पागल,
किसका उल्लास छूता है आकाश -
छात्र का ? या आपका ?
हर उस रोज होती है
स्थापना ....!
शाश्वत सच की
जिस तक पहुचाने का माध्यम
अगर कोई है तो वह....
कोई और नहीं शिक्षक ही है.......!
सादर प्रणाम......!
एक पत्र उन शिक्षकों के नाम
जिन्हों ने जहां को रोशन करने में
अपना सब कुछ लुटा दिया ।
परम आदरणीय,
सादर...!
आपके योगदान को
कैसे भूलेगा यह संसार ?
क्या आपको एक दिवस ही काफी है ?
जब पुरस्कृत होता है छात्र
उसके पार्श्व में और कौन है
आपके सिवाय,
किसे मिलता है पुरस्कार,
कौन होता है हर्षातिरेक से पागल,
किसका उल्लास छूता है आकाश -
छात्र का ? या आपका ?
हर उस रोज होती है
स्थापना ....!
शाश्वत सच की
जिस तक पहुचाने का माध्यम
अगर कोई है तो वह....
कोई और नहीं शिक्षक ही है.......!
सादर प्रणाम......!
Friday, September 4, 2009
मेरे कुछ मुक्तक
सुबह से शाम तक बैठा रहा
तेरे इन्त्जार में
तुम हो
कि आये और चल दिये ..।
मुद्दत बाद
तुम्हारा दीदार हुआ
चलो अच्छा हुआ
एक बार हुआ...
हम मुसाफिर हैं
ये राह हो न हो
रहगुजर तो है
साथ चलते रहेंगे...।
तुम्हारा खयाल आया
तो यादों के साथ हो लिए
साथ तुम तो न थे
तुम्हारी याद ही सही..।
हम तो आये थे
कुर्बान होने को
यहां देखा तो
तुम विदा हो रही थी ...।
तेरे इन्त्जार में
तुम हो
कि आये और चल दिये ..।
मुद्दत बाद
तुम्हारा दीदार हुआ
चलो अच्छा हुआ
एक बार हुआ...
हम मुसाफिर हैं
ये राह हो न हो
रहगुजर तो है
साथ चलते रहेंगे...।
तुम्हारा खयाल आया
तो यादों के साथ हो लिए
साथ तुम तो न थे
तुम्हारी याद ही सही..।
हम तो आये थे
कुर्बान होने को
यहां देखा तो
तुम विदा हो रही थी ...।
Thursday, September 3, 2009
सब कुछ पहले सा हो गया...
मैने देखा
एक आदमी का जीवन
कैसे बदलता है
समय ने जख्म कैसे भर दिया
कभी उसकी चित्कार ने
झकझोर कर रख दिया
और आज
पुन: आस्थावान है
उसमें जीवन को लेकर
फिर से आस जगी है
नयी नयी बातें करता है वह
सभी
सब कुछ पहले सा हो गया...
शायद यही समय की मांग है..?
निराशा ने दम तोड़ दिया
आज आशावान हो गया है
अतीत के दुख दर्द
गये जमाने की है बात
भावप्रवणता ने उंचाई पा ली है
सब कुछ पहले सा हो गया....!
एक आदमी का जीवन
कैसे बदलता है
समय ने जख्म कैसे भर दिया
कभी उसकी चित्कार ने
झकझोर कर रख दिया
और आज
पुन: आस्थावान है
उसमें जीवन को लेकर
फिर से आस जगी है
नयी नयी बातें करता है वह
सभी
सब कुछ पहले सा हो गया...
शायद यही समय की मांग है..?
निराशा ने दम तोड़ दिया
आज आशावान हो गया है
अतीत के दुख दर्द
गये जमाने की है बात
भावप्रवणता ने उंचाई पा ली है
सब कुछ पहले सा हो गया....!
Wednesday, September 2, 2009
सागर से लहरें उठती हैं
सागर से लहरें उठती हैं
साहिल की ओर
निरन्तर बढ़ने को उत्सुक
इनकी उमंगें
शान्त पवन को झकझोरती हूई
निर्द्वन्द, निर्लिप्त निश्चेष्ट भाव से
पुकार रही हैं.................।
आओ......!
मुझमें निहित अन्तष्चेतना के साथ
यात्रा करें उस ओर
जहां बसती है दुनियां
रंग बिरंगी
प्रकृति के कुछ अद्भुत नजारे।
इन नजारों को
निरखने को तत्पर
हमारी आंखें
करने को अंकित आतुरता से.....!
अपने मानस पटल पर
रच जाय ऐसा आयाम
जो दे सके
अकल्पित, शाश्वत, निर्मल ,पावन
हृदयंगम हो जाय
ऐसी खुशियां
सबके बीच सौहार्द्र..........!
साहिल की ओर
निरन्तर बढ़ने को उत्सुक
इनकी उमंगें
शान्त पवन को झकझोरती हूई
निर्द्वन्द, निर्लिप्त निश्चेष्ट भाव से
पुकार रही हैं.................।
आओ......!
मुझमें निहित अन्तष्चेतना के साथ
यात्रा करें उस ओर
जहां बसती है दुनियां
रंग बिरंगी
प्रकृति के कुछ अद्भुत नजारे।
इन नजारों को
निरखने को तत्पर
हमारी आंखें
करने को अंकित आतुरता से.....!
अपने मानस पटल पर
रच जाय ऐसा आयाम
जो दे सके
अकल्पित, शाश्वत, निर्मल ,पावन
हृदयंगम हो जाय
ऐसी खुशियां
सबके बीच सौहार्द्र..........!
Tuesday, September 1, 2009
समय भी अब धीरे-धीरे चलने लगा
कब से देखता रहा तुम्हारी राह
तुम ना आये
तुम्हारा न आना
समय की गति को भी परिवर्तित कर दिया ।
समय भी अब धीरे-धीरे चलने लगा
आज तुम न सही
तुम्हारी यादें तो हैं
बीते हुए कल का
जब भी पलटता हूं
एक-एक पन्ना
तुम्हारे साथ जिया एक-एक पल ।
हरा हो जाता है क्षण-क्षण
और फिर खो जाता हूं
उस पल में
कुछ भी याद नहीं रहता
कि और भी कुछ करना है।
तुमने दिया था एक सम्बल
हमारे स्वत्व को
और पुन: लौटा मुझमें आत्मविश्वास ।
तुम ना आये
तुम्हारा न आना
समय की गति को भी परिवर्तित कर दिया ।
समय भी अब धीरे-धीरे चलने लगा
आज तुम न सही
तुम्हारी यादें तो हैं
बीते हुए कल का
जब भी पलटता हूं
एक-एक पन्ना
तुम्हारे साथ जिया एक-एक पल ।
हरा हो जाता है क्षण-क्षण
और फिर खो जाता हूं
उस पल में
कुछ भी याद नहीं रहता
कि और भी कुछ करना है।
तुमने दिया था एक सम्बल
हमारे स्वत्व को
और पुन: लौटा मुझमें आत्मविश्वास ।
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